कोरबा में हिंदू नारायणी सेना ने गणेश प्रतिमाओं के शास्त्रसम्मत स्वरूप और पीओपी (Plaster of Paris) से बनी मूर्तियों पर रोक लगाने की मांग करते हुए कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा। संगठन ने धार्मिक परंपराओं के संरक्षण, पर्यावरण सुरक्षा और नियमों के पालन की मांग की।
कोरबा (वंदे छत्तीसगढ़ मीडिया) में गणेश प्रतिमाओं के स्वरूप और पीओपी मूर्तियों को लेकर प्रशासन से हस्तक्षेप की मांग गणेश उत्सव की तैयारियों के बीच छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में भगवान गणेश की प्रतिमाओं के स्वरूप और प्लास्टर ऑफ पेरिस (पीओपी) से बनी मूर्तियों को लेकर नया विवाद सामने आया है। हिंदू नारायणी सेना ने जिला कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर मांग की है कि शास्त्रों के अनुरूप प्रतिमाओं का निर्माण सुनिश्चित कराया जाए और पीओपी से बनी प्रतिमाओं के निर्माण एवं बिक्री पर प्रभावी कार्रवाई की जाए।
संगठन का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में गणेश प्रतिमाओं के पारंपरिक स्वरूप में बड़े बदलाव देखने को मिले हैं। बाजार में कार्टून शैली, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) आधारित डिज़ाइन, नृत्य मुद्रा या अन्य आधुनिक रूपों में प्रतिमाएं तैयार की जा रही हैं, जो धार्मिक परंपराओं और आस्था के अनुरूप नहीं हैं। इसके साथ ही पीओपी से बनी प्रतिमाओं के बढ़ते उपयोग को भी संगठन ने पर्यावरण के लिए गंभीर चिंता का विषय बताया है।
धार्मिक परंपराओं के संरक्षण पर दिया गया जोर
हिंदू नारायणी सेना के प्रतिनिधियों ने ज्ञापन में कहा कि भगवान गणेश हिंदू धर्म में प्रथम पूज्य देवता माने जाते हैं। ऐसे में उनकी प्रतिमाओं का निर्माण धार्मिक ग्रंथों और पारंपरिक मान्यताओं के अनुरूप होना चाहिए। संगठन का मानना है कि अत्यधिक आधुनिक या मनोरंजन आधारित स्वरूप धार्मिक भावनाओं को प्रभावित कर सकते हैं।
प्रतिनिधियों ने प्रशासन से अनुरोध किया कि मूर्तिकारों और प्रतिमा विक्रेताओं को निर्धारित दिशा-निर्देशों का पालन करने के लिए प्रेरित किया जाए, ताकि धार्मिक परंपराओं का सम्मान बना रहे और किसी प्रकार का विवाद उत्पन्न न हो।
पीओपी प्रतिमाओं से पर्यावरण को नुकसान की चिंता
ज्ञापन में प्लास्टर ऑफ पेरिस (पीओपी) से बनी प्रतिमाओं का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया। संगठन का कहना है कि पीओपी पानी में आसानी से नहीं घुलता और विसर्जन के बाद जलाशयों में लंबे समय तक बना रहता है। इसके अलावा इन प्रतिमाओं पर उपयोग किए जाने वाले रासायनिक रंग जल प्रदूषण का कारण बन सकते हैं।
संगठन ने कहा कि यदि मिट्टी से बनी प्राकृतिक प्रतिमाओं का उपयोग बढ़ाया जाए तो जल स्रोतों की स्वच्छता बनाए रखने में मदद मिलेगी और पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिलेगा। यही कारण है कि पर्यावरण अनुकूल प्रतिमाओं को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है।
कलेक्टर को सौंपा गया ज्ञापन

हिंदू नारायणी सेना के पदाधिकारियों ने जिला कलेक्टर से मुलाकात कर अपनी मांगों से संबंधित ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में प्रशासन से अनुरोध किया गया कि संबंधित विभागों के माध्यम से प्रतिमा निर्माण और बिक्री पर आवश्यक निगरानी रखी जाए तथा यदि किसी प्रकार के नियमों का उल्लंघन पाया जाए तो नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
संगठन के अनुसार, प्रशासन का उद्देश्य किसी कलाकार या मूर्तिकार को परेशान करना नहीं बल्कि धार्मिक परंपराओं और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखना होना चाहिए।
प्रशासन ने दिया आवश्यक कार्रवाई का आश्वासन
ज्ञापन प्राप्त करने के बाद जिला कलेक्टर ने प्रतिनिधिमंडल को आश्वस्त किया कि उनकी मांगों का परीक्षण किया जाएगा और यदि किसी प्रकार के कानूनी प्रावधान लागू होते हैं तो संबंधित विभागों के माध्यम से आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।
प्रशासन की ओर से यह भी संकेत दिया गया कि कानून और शासन के निर्धारित नियमों के अनुसार ही आगे की प्रक्रिया अपनाई जाएगी।
लोगों से की पारंपरिक और पर्यावरण अनुकूल प्रतिमाएं अपनाने की अपील
हिंदू नारायणी सेना ने आम नागरिकों से भी अपील की है कि वे इस वर्ष गणेश उत्सव के दौरान मिट्टी से बनी पारंपरिक और पर्यावरण अनुकूल प्रतिमाओं को प्राथमिकता दें। संगठन का कहना है कि इससे एक ओर धार्मिक परंपराओं का सम्मान होगा तो दूसरी ओर पर्यावरण संरक्षण में भी सकारात्मक योगदान मिलेगा।
संगठन ने श्रद्धालुओं से यह भी आग्रह किया कि गणेश उत्सव केवल उत्साह का पर्व नहीं बल्कि प्रकृति और संस्कृति के प्रति जिम्मेदारी निभाने का भी अवसर है।
गणेश उत्सव के दौरान बढ़ जाती है प्रतिमाओं की मांग
हर वर्ष गणेश उत्सव से पहले प्रतिमा निर्माण का कार्य तेज हो जाता है। छोटे-बड़े मूर्तिकार विभिन्न आकार और डिज़ाइन की प्रतिमाएं तैयार करते हैं। बदलते समय के साथ बाजार में आधुनिक थीम आधारित प्रतिमाओं की मांग भी बढ़ी है, जबकि दूसरी ओर पारंपरिक स्वरूप को बनाए रखने की मांग करने वाले संगठनों की संख्या भी बढ़ रही है।
इसी कारण हर वर्ष धार्मिक परंपरा, पर्यावरण संरक्षण और बाजार की मांग के बीच संतुलन बनाए रखने पर चर्चा होती रहती है।
पर्यावरण और आस्था दोनों का संतुलन जरूरी
विशेषज्ञों का मानना है कि धार्मिक उत्सवों का उद्देश्य समाज में सकारात्मक ऊर्जा और सांस्कृतिक मूल्यों को मजबूत करना है। यदि पर्यावरण संरक्षण और धार्मिक परंपराओं को साथ लेकर चलने का प्रयास किया जाए तो समाज के लिए बेहतर परिणाम सामने आ सकते हैं। मिट्टी की प्रतिमाओं का उपयोग, प्राकृतिक रंगों का प्रयोग और निर्धारित विसर्जन स्थलों का पालन जैसे उपाय गणेश उत्सव को अधिक पर्यावरण अनुकूल बना सकते हैं। कोरबा में हिंदू नारायणी सेना द्वारा सौंपे गए ज्ञापन ने गणेश प्रतिमाओं के स्वरूप और पीओपी से बनी मूर्तियों के मुद्दे को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। संगठन ने धार्मिक परंपराओं के सम्मान, पर्यावरण संरक्षण और नियमों के पालन की मांग करते हुए प्रशासन से आवश्यक कार्रवाई का अनुरोध किया है। अब प्रशासन की आगामी कार्रवाई और स्थानीय स्तर पर होने वाले निर्णयों पर सभी की नजर बनी हुई है।
