कोरबा की बंद कोयला खदानों को अब वीरान नहीं छोड़ा जाएगा। एसईसीएल ने माइन क्लोजर प्लान के तहत प्रशिक्षण केंद्र, सीबीजी प्लांट, हरित विकास और फलदार पौधों के रोपण की योजना बनाई है। जानिए कोलियरी नियंत्रण संशोधन नियम-2026 और 54 खदानों की पूरी जानकारी।
कोरबा (वंदे छत्तीसगढ़ मीडिया)। छत्तीसगढ़ के ऊर्जा नगर के रूप में पहचाने जाने वाले कोरबा में कोयला खदानों का भविष्य अब केवल खनन तक सीमित नहीं रहेगा। जिन खदानों से वर्षों तक देश की ऊर्जा जरूरतें पूरी हुईं, उनके बंद होने के बाद अब उन्हें वीरान छोड़ने के बजाय विकास, पर्यावरण संरक्षण और सामुदायिक उपयोग का नया केंद्र बनाया जाएगा। दक्षिण पूर्वी कोलफील्ड्स लिमिटेड (एसईसीएल) ने बंद हो रही खदानों के लिए एक व्यापक माइन क्लोजर प्लान तैयार किया है, जिसके तहत इन क्षेत्रों में प्रशिक्षण केंद्र, कंप्रेस्ड बायो-गैस (सीबीजी) संयंत्र, हरित क्षेत्र और फलदार पौधों का विकास किया जाएगा।
यह पहल केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि स्थानीय लोगों के लिए रोजगार, कौशल विकास और टिकाऊ विकास का नया मॉडल भी बनेगी।
बंद खदानों को मिलेगा नया जीवन

कोयला खदानें वर्षों तक क्षेत्र की अर्थव्यवस्था का आधार रही हैं। लेकिन जब किसी खदान का कोयला समाप्त हो जाता है या उत्पादन आर्थिक रूप से व्यवहारिक नहीं रह जाता, तब उसे बंद करना पड़ता है। अब तक ऐसी कई खदानें बंद होने के बाद उपेक्षित हो जाती थीं, जिससे पर्यावरणीय और सामाजिक समस्याएं भी सामने आती थीं।
एसईसीएल ने इस व्यवस्था को बदलने का निर्णय लिया है। अब बंद खदानों को पुनर्विकसित कर उन्हें समाज और पर्यावरण के लिए उपयोगी बनाया जाएगा। इससे न केवल भूमि का बेहतर उपयोग होगा बल्कि आसपास रहने वाले लोगों को भी नए अवसर मिलेंगे।
बांकी भूमिगत खदान बनेगी मॉडल परियोजना
एसईसीएल ने कोरबा क्षेत्र की बांकी भूमिगत खदान को इस नई पहल के लिए मॉडल के रूप में विकसित करने की योजना बनाई है। यहां कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं शुरू की जाएंगी, जिनमें शामिल हैं—
- कौशल विकास और तकनीकी प्रशिक्षण केंद्र।
- कंप्रेस्ड बायो-गैस (सीबीजी) संयंत्र की स्थापना।
- फलदार और छायादार पौधों का बड़े स्तर पर रोपण।
- हरित क्षेत्र और सामुदायिक उपयोग की सुविधाओं का विकास।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह मॉडल सफल रहता है तो इसे एसईसीएल के अन्य बंद खदान क्षेत्रों में भी लागू किया जा सकता है।
कोलियरी नियंत्रण संशोधन नियम-2026 से आएगा बड़ा बदलाव

हाल ही में लागू किए गए कोलियरी नियंत्रण संशोधन नियम-2026 के तहत खदान संचालन से जुड़े नियमों में महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं।
नए प्रावधान के अनुसार यदि कोई खदान 180 दिन या उससे अधिक समय तक बंद रहती है, तो उसे दोबारा चालू करने के लिए निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया का पालन करना होगा। इसका उद्देश्य खदान संचालन में पारदर्शिता बढ़ाना, सुरक्षा मानकों को सुनिश्चित करना और पर्यावरणीय नियमों का सख्ती से पालन कराना है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह नियम खदानों के अनियोजित संचालन पर रोक लगाने के साथ-साथ बंद खदानों के वैज्ञानिक प्रबंधन को भी बढ़ावा देगा।
54 खदानों की पहचान, 28 पहले ही हो चुकी हैं बंद
एसईसीएल ने अपने माइन क्लोजर प्लान के तहत कुल 54 खदानों की पहचान की है।
इनमें—
- 28 खदानों को पहले ही बंद किया जा चुका है।
- शेष खदानों को वर्ष 2027-28 तक चरणबद्ध तरीके से बंद करने का लक्ष्य रखा गया है।
इन सभी खदानों के लिए अलग-अलग पुनर्विकास योजनाएं तैयार की जा रही हैं ताकि प्रत्येक क्षेत्र की भौगोलिक और सामाजिक आवश्यकताओं के अनुसार उनका उपयोग किया जा सके।
सीबीजी प्लांट से बढ़ेगी हरित ऊर्जा
बंद खदान क्षेत्र में प्रस्तावित कंप्रेस्ड बायो-गैस (सीबीजी) संयंत्र इस परियोजना की सबसे महत्वपूर्ण योजनाओं में से एक माना जा रहा है।
सीबीजी संयंत्र के माध्यम से जैविक अपशिष्ट से स्वच्छ ईंधन तैयार किया जाएगा। इससे—
- पारंपरिक ईंधन पर निर्भरता कम होगी।
- कार्बन उत्सर्जन में कमी आएगी।
- स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा।
- स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।
देश में हरित ऊर्जा को बढ़ावा देने की दिशा में यह कदम महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
फलदार पौधों से बढ़ेगा हरित आवरण
खनन के कारण प्रभावित भूमि को फिर से हराभरा बनाने के लिए बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण किया जाएगा।
विशेष रूप से फलदार पौधों के रोपण की योजना इसलिए बनाई गई है ताकि—
- जैव विविधता को बढ़ावा मिले।
- स्थानीय लोगों को भविष्य में आर्थिक लाभ मिल सके।
- मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार हो।
- पर्यावरणीय संतुलन मजबूत हो।
खनन के बाद भूमि पुनर्वास (Mine Reclamation) की दिशा में यह पहल महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
स्थानीय युवाओं को मिलेगा कौशल विकास का अवसर
एसईसीएल की योजना में केवल पर्यावरण संरक्षण ही नहीं बल्कि सामाजिक विकास पर भी विशेष जोर दिया गया है।
प्रशिक्षण केंद्र स्थापित होने से स्थानीय युवाओं को विभिन्न तकनीकी और रोजगारपरक प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाएगा। इससे उन्हें उद्योग, ऊर्जा, मशीन संचालन, सुरक्षा, हरित तकनीक और अन्य क्षेत्रों में रोजगार प्राप्त करने में सहायता मिल सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि खनन आधारित अर्थव्यवस्था से आगे बढ़कर कौशल आधारित अर्थव्यवस्था विकसित करने की दिशा में यह महत्वपूर्ण कदम होगा।
पर्यावरण संरक्षण और विकास का संतुलित मॉडल
खनन के दौरान भूमि, वनस्पति और पर्यावरण पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। इसलिए आधुनिक माइन क्लोजर प्लान केवल खदान बंद करने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि भूमि को पुनर्जीवित करने, जल संरक्षण, हरित विकास और सामुदायिक उपयोग को भी प्राथमिकता देता है।
एसईसीएल की यह योजना इसी सोच को आगे बढ़ाती है, जिसमें आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण दोनों के बीच संतुलन बनाने का प्रयास किया जा रहा है।
स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मिलेगा लाभ
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बंद खदान क्षेत्रों का उपयोग प्रशिक्षण, हरित उद्योग और सामुदायिक परियोजनाओं के लिए किया जाता है तो इससे आसपास के गांवों और कस्बों की अर्थव्यवस्था को भी नई गति मिलेगी।
नई परियोजनाओं से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार बढ़ने की संभावना है। साथ ही इन क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं का विकास भी तेज हो सकता है।
भविष्य की दिशा
कोरबा जैसे खनन प्रधान क्षेत्र के लिए यह पहल केवल बंद खदानों के पुनर्विकास की योजना नहीं, बल्कि विकास की नई सोच का संकेत है। वर्षों तक ऊर्जा उत्पादन का आधार रही खदानें अब पर्यावरण संरक्षण, हरित ऊर्जा, कौशल विकास और सामुदायिक उपयोग का केंद्र बन सकती हैं।
यदि एसईसीएल की यह योजना निर्धारित समय पर सफलतापूर्वक लागू होती है, तो यह देश के अन्य कोयला क्षेत्रों के लिए भी एक आदर्श मॉडल साबित हो सकती है। इससे यह संदेश भी जाएगा कि प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के बाद उनकी जिम्मेदार पुनर्बहाली भी उतनी ही आवश्यक है।
