छत्तीसगढ़ में इस रक्षाबंधन खस की जड़ों से बनी प्राकृतिक राखियां खास आकर्षण का केंद्र हैं। पानी की बूंद पड़ते ही इनमें से सोंधी खुशबू निकलती है। जानिए इन राखियों की खासियत, निर्माण और रोजगार से जुड़ी पूरी कहानी।
छत्तीसगढ़ (वंदे छत्तीसगढ़ मीडिया)। रक्षाबंधन का त्योहार भाई-बहन के स्नेह और रिश्ते की मिठास से जुड़ा पर्व है। हर साल बाजार में अलग-अलग तरह की राखियां देखने को मिलती हैं, लेकिन इस बार छत्तीसगढ़ में तैयार की जा रही खस की जड़ों से बनी राखियां अपनी अनोखी खूबी के कारण लोगों का ध्यान खींच रही हैं। इन राखियों की खास बात यह है कि कलाई पर बांधने के बाद पानी की एक बूंद या हल्की नमी पड़ते ही इनमें से प्राकृतिक और सोंधी खुशबू आने लगती है।
इन राखियों को पारंपरिक हस्तकला और प्राकृतिक संसाधनों के मेल से तैयार किया जा रहा है। खास बात यह भी है कि इनके निर्माण में कृत्रिम सजावटी सामग्री के बजाय खस जैसी प्राकृतिक सामग्री का उपयोग किया गया है। यही वजह है कि ये राखियां केवल भाई-बहन के रिश्ते का प्रतीक नहीं, बल्कि पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता और स्थानीय संसाधनों से रोजगार सृजन का संदेश भी दे रही हैं।
खस की जड़ों से बनी राखी क्यों है खास?
खस एक सुगंधित घास है, जिसकी जड़ों में प्राकृतिक खुशबू पाई जाती है। गर्मी के मौसम में खस का इस्तेमाल ठंडक और सुगंध के लिए लंबे समय से किया जाता रहा है। खस की जड़ों से बनी चटाइयों, पर्दों और अन्य उपयोगी वस्तुओं के बारे में तो लोगों ने सुना है, लेकिन इन्हीं जड़ों को राखी के रूप में इस्तेमाल करना इस पहल को खास बनाता है।
इन राखियों की सबसे दिलचस्प विशेषता उनकी खुशबू है। सामान्य राखियों की तरह इनमें अलग से तेज कृत्रिम सुगंध देने की जरूरत नहीं पड़ती। जब खस की जड़ों को पानी या नमी मिलती है तो उनकी प्राकृतिक सुगंध उभरने लगती है। ऐसे में भाई की कलाई पर बंधी राखी केवल दिखाई ही नहीं देती, बल्कि आसपास हल्की सोंधी खुशबू भी बिखेरती है।
रक्षाबंधन जैसे अवसर पर यह अनुभव लोगों के लिए नया और आकर्षक हो सकता है। एक ओर जहां बहन भाई की कलाई पर प्रेम का धागा बांधती है, वहीं खस की प्राकृतिक खुशबू इस भावनात्मक रिश्ते को प्रकृति से भी जोड़ देती है।
स्थानीय लोगों को रोजगार से जोड़ने की पहल

इन विशेष राखियों के निर्माण के पीछे केवल त्योहार को ध्यान में रखकर उत्पाद तैयार करने का उद्देश्य नहीं है। इसके साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार और आजीविका के अवसर पैदा करने की कोशिश भी जुड़ी हुई है।
वन मंत्री केदार कश्यप की पहल पर छत्तीसगढ़ आदिवासी, स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधि पादप बोर्ड स्थानीय लोगों को इस तरह के प्राकृतिक उत्पादों के निर्माण से जोड़ने का काम कर रहा है। इसका उद्देश्य स्थानीय संसाधनों और पारंपरिक ज्ञान का उपयोग करते हुए ग्रामीण तथा वन क्षेत्रों से जुड़े लोगों के लिए आय के अवसर बढ़ाना है।
स्थानीय स्तर पर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों को केवल कच्चे माल के रूप में देखने के बजाय उनसे उपयोगी और बाजार में मांग वाले उत्पाद तैयार करना ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। खस की राखी इसी सोच का एक उदाहरण है।
पर्यावरण के लिहाज से भी अलग पहचान

आज त्योहारों में पर्यावरण अनुकूल उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है। प्लास्टिक, सिंथेटिक फाइबर और अन्य गैर-जैव अपघटनीय सामग्री से बनी सजावटी वस्तुओं के बीच प्राकृतिक सामग्री से तैयार उत्पाद अलग पहचान बनाते हैं।
खस की जड़ों से तैयार राखियों को इसी दिशा में एक पर्यावरण अनुकूल विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है। इनके निर्माण में प्राकृतिक सामग्री का इस्तेमाल होने के कारण त्योहार के बाद इनके निपटान को लेकर भी अपेक्षाकृत कम चिंता रहती है। यही वजह है कि प्रकृति से जुड़ा यह उत्पाद रक्षाबंधन की पारंपरिक भावना के साथ आधुनिक पर्यावरणीय सोच को भी जोड़ता है।
हालांकि किसी भी प्राकृतिक उत्पाद की पर्यावरणीय उपयोगिता उसके पूरे निर्माण और निपटान की प्रक्रिया पर निर्भर करती है, लेकिन प्राकृतिक एवं बायोडिग्रेडेबल सामग्री के इस्तेमाल की दिशा में ऐसी पहल निश्चित रूप से लोगों का ध्यान आकर्षित करती है।
परंपरा में जुड़ रहा है नया प्रयोग
राखी का मूल भाव बेहद सरल है—बहन भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती है और दोनों के बीच स्नेह, विश्वास तथा अपनत्व का रिश्ता मजबूत होता है। समय के साथ राखियों के डिजाइन और सामग्री में बदलाव आया है। अब बाजार में बच्चों के लिए कार्टून कैरेक्टर वाली राखियों से लेकर मोती, रुद्राक्ष, कपड़े और अन्य प्राकृतिक सामग्री से बनी राखियां भी उपलब्ध हैं।
इसी बदलती परंपरा के बीच छत्तीसगढ़ की खस राखी एक स्थानीय और प्राकृतिक प्रयोग के रूप में सामने आई है। इसकी खासियत केवल इसका अलग डिजाइन नहीं, बल्कि पानी की बूंद पड़ने पर खुशबू देने वाली विशेषता है। इससे यह राखी सामान्य राखियों की तुलना में अलग अनुभव देती है।
बहनों के प्यार के साथ प्रकृति की खुशबू

वन मंत्री केदार कश्यप ने इस पहल को लेकर कहा कि इस बार बहनों का प्यार सिर्फ राखी के धागे में नहीं, बल्कि प्रकृति की सुगंध के साथ भाइयों की कलाई पर महकेगा। यह बात इस पहल के उद्देश्य को काफी हद तक सामने रखती है।
दरअसल, रक्षाबंधन पर राखी खरीदना केवल एक बाजार गतिविधि नहीं है। बहुत से परिवार आज भी ऐसी राखी पसंद करते हैं जिसमें स्थानीयता, सादगी और भावनात्मक जुड़ाव दिखाई दे। खस की राखी इसी भावना को आगे बढ़ाती नजर आती है।
छत्तीसगढ़ की स्थानीय पहचान को मिल सकता है नया बाजार
छत्तीसगढ़ में वन और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े अनेक पारंपरिक उत्पाद पहले से ही स्थानीय जीवन का हिस्सा रहे हैं। यदि ऐसे उत्पादों को बेहतर डिजाइन, पैकेजिंग और बाजार उपलब्ध कराया जाए तो वे स्थानीय बाजार के साथ-साथ राज्य के बाहर भी अपनी पहचान बना सकते हैं।
खस की राखियां इसी संभावना की ओर संकेत करती हैं। त्योहारों के लिए स्थानीय स्तर पर तैयार प्राकृतिक उत्पादों को बढ़ावा मिलने से एक तरफ लोगों को रोजगार मिल सकता है, वहीं दूसरी ओर उपभोक्ताओं को स्थानीय और पर्यावरण अनुकूल विकल्प भी उपलब्ध हो सकते हैं।
रक्षाबंधन के मौके पर खस की ये राखियां इसलिए भी चर्चा में हैं क्योंकि इनमें भाई-बहन के रिश्ते की पारंपरिक भावना के साथ छत्तीसगढ़ की प्राकृतिक संपदा और स्थानीय हुनर की झलक दिखाई देती है। कलाई पर बंधी राखी जब पानी की बूंद से महक उठेगी, तो यह त्योहार के उस भाव को भी याद दिलाएगी कि प्रकृति के साथ जुड़कर मनाए गए उत्सव की अपनी अलग खूबसूरती होती है।
