बस्तर में मलेरिया नियंत्रण की सफलता की कहानी। बैगा-गुनिया, मितानिन और स्वास्थ्य विभाग की संयुक्त पहल से 10 वर्षों में मलेरिया के मामलों में 83% की कमी दर्ज। जानिए कैसे जागरूकता, मच्छरदानी और समय पर जांच ने बदली तस्वीर।
जगदलपुर (वंदे छत्तीसगढ़ मीडिया)। कभी मलेरिया के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में गिने जाने वाले बस्तर संभाग की तस्वीर अब तेजी से बदल रही है। घने जंगलों, दुर्गम पहाड़ियों और दूरस्थ आदिवासी गांवों में स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाना हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है, लेकिन अब स्वास्थ्य विभाग ने इस चुनौती को अवसर में बदल दिया है। दवा और जांच के साथ-साथ व्यापक जनजागरूकता अभियान ने मलेरिया नियंत्रण में उल्लेखनीय सफलता दिलाई है।
स्वास्थ्य विभाग की लगातार मेहनत, बैगा-गुनिया, मितानिन, एएनएम और मैदानी स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की सक्रिय भागीदारी तथा ग्रामीणों के सहयोग से पिछले लगभग दस वर्षों में बस्तर में मलेरिया के मामलों में करीब 83 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। यह उपलब्धि केवल सरकारी प्रयासों का परिणाम नहीं बल्कि स्थानीय समुदाय और स्वास्थ्य व्यवस्था के बीच मजबूत विश्वास का प्रतीक भी बन गई है।
गांव-गांव पहुंच रही स्वास्थ्य टीम
बस्तर के सुदूर गांवों में आज स्वास्थ्य विभाग की टीमें नियमित रूप से पहुंच रही हैं। इन टीमों का उद्देश्य केवल मरीजों का उपचार करना नहीं बल्कि लोगों को बीमारी से बचाव के प्रति जागरूक बनाना भी है।
स्वास्थ्य कार्यकर्ता घर-घर जाकर लोगों को समझा रहे हैं कि यदि किसी व्यक्ति को बुखार आता है तो उसे सामान्य बुखार समझकर नजरअंदाज न करें। तुरंत स्वास्थ्य केंद्र या जांच शिविर में जाकर मलेरिया की जांच कराएं। समय पर जांच और इलाज से बीमारी को गंभीर होने से रोका जा सकता है।
इसके साथ ही प्रत्येक परिवार को यह भी बताया जा रहा है कि मच्छरदानी केवल सरकारी वितरण का सामान नहीं है, बल्कि यह परिवार की सुरक्षा का सबसे प्रभावी माध्यम है। स्वास्थ्य कार्यकर्ता यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि प्रत्येक परिवार हर रात नियमित रूप से मच्छरदानी का उपयोग करे।
बैगा-गुनिया निभा रहे अहम भूमिका
बस्तर के आदिवासी समाज में बैगा-गुनिया का विशेष सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व है। ग्रामीण समुदाय इनकी बातों पर विश्वास करता है। इसी विश्वास को स्वास्थ्य विभाग ने जनहित में सकारात्मक रूप से जोड़ा है।
अब बैगा-गुनिया भी लोगों को मलेरिया से बचाव के उपाय बता रहे हैं। वे ग्रामीणों को समय पर जांच कराने, स्वास्थ्य केंद्र जाने और चिकित्सकीय सलाह लेने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। इससे लोगों में स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति भरोसा बढ़ा है और इलाज में देरी की समस्या काफी हद तक कम हुई है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि जब स्थानीय समुदाय के सम्मानित लोग किसी अभियान से जुड़ते हैं तो उसका प्रभाव कहीं अधिक व्यापक और स्थायी होता है। बस्तर इसका सफल उदाहरण बनकर सामने आया है।
मितानिन और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की मेहनत लाई रंग
छत्तीसगढ़ की मितानिन व्यवस्था लंबे समय से ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं की मजबूत कड़ी रही है। बस्तर में भी मितानिन, एएनएम और अन्य स्वास्थ्य कार्यकर्ता लगातार घर-घर जाकर लोगों की स्वास्थ्य संबंधी जानकारी जुटा रहे हैं।
वे बुखार से पीड़ित लोगों की पहचान करते हैं, जांच के लिए प्रेरित करते हैं और जरूरत पड़ने पर उन्हें स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचाने में भी मदद करते हैं। इसके अलावा नियमित फॉलोअप के जरिए यह सुनिश्चित किया जाता है कि मरीज इलाज बीच में न छोड़े।
ग्रामीण क्षेत्रों में यह निरंतर संपर्क ही मलेरिया नियंत्रण अभियान की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरा है।
जागरूकता बनी सबसे प्रभावी हथियार
विशेषज्ञों का कहना है कि मलेरिया से बचाव में जागरूकता सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यदि लोग बीमारी के शुरुआती लक्षण पहचान लें और समय पर जांच करवा लें तो गंभीर स्थिति से बचा जा सकता है।
इसी सोच के साथ स्वास्थ्य विभाग विभिन्न माध्यमों से लगातार जागरूकता अभियान चला रहा है। गांवों में बैठकें आयोजित की जा रही हैं, दीवार लेखन, पोस्टर, जनसंवाद और व्यक्तिगत संपर्क के माध्यम से लोगों को जानकारी दी जा रही है।
ग्रामीणों को यह भी बताया जा रहा है कि घरों और आसपास पानी जमा न होने दें, साफ-सफाई बनाए रखें तथा शाम के समय मच्छरों से बचाव के सभी उपाय अपनाएं।
दस वर्षों में 83 प्रतिशत की कमी एक बड़ी उपलब्धि

बस्तर में पिछले दस वर्षों के दौरान मलेरिया के मामलों में लगभग 83 प्रतिशत की कमी दर्ज होना इस बात का प्रमाण है कि यदि स्वास्थ्य योजनाओं को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार लागू किया जाए तो उल्लेखनीय परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं।
पहले जहां बरसात के मौसम में बड़ी संख्या में मलेरिया के मरीज सामने आते थे, वहीं अब लगातार निगरानी, त्वरित जांच, समय पर उपचार और जागरूकता अभियान के कारण संक्रमण की श्रृंखला को काफी हद तक नियंत्रित किया जा चुका है।
स्वास्थ्य विभाग का लक्ष्य केवल मरीजों का इलाज करना नहीं बल्कि मलेरिया को जड़ से समाप्त करने की दिशा में लगातार काम करना है।
बरसात के मौसम में बढ़ाई गई सतर्कता

बरसात का मौसम मलेरिया के लिए सबसे संवेदनशील माना जाता है। इस दौरान मच्छरों की संख्या तेजी से बढ़ती है, इसलिए स्वास्थ्य विभाग ने विशेष निगरानी अभियान शुरू किया है।
स्वास्थ्य टीमें नियमित रूप से गांवों का दौरा कर रही हैं। जहां भी बुखार के मरीज मिलते हैं, वहां तत्काल जांच की जा रही है। आवश्यक होने पर दवाइयों का वितरण और इलाज भी मौके पर उपलब्ध कराया जा रहा है।
इसके साथ ही मच्छरदानी वितरण और उसके सही उपयोग पर विशेष जोर दिया जा रहा है ताकि संक्रमण फैलने की संभावना कम हो सके।
ग्रामीणों की भागीदारी बनी सफलता की कुंजी

स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि किसी भी जनस्वास्थ्य अभियान की सफलता तभी संभव है जब उसमें स्थानीय लोगों की सक्रिय भागीदारी हो। बस्तर में ग्रामीणों ने इस अभियान को अपना अभियान मानकर सहयोग दिया है।
अब कई गांवों में लोग स्वयं दूसरों को मच्छरदानी उपयोग करने, बुखार होने पर जांच कराने और साफ-सफाई बनाए रखने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। इससे जागरूकता का दायरा लगातार बढ़ रहा है।
आगे भी जारी रहेगा अभियान
स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि मलेरिया नियंत्रण की यह सफलता अंतिम लक्ष्य नहीं है। आने वाले समय में भी गांव-गांव जागरूकता अभियान, नियमित सर्वे, त्वरित जांच, समय पर उपचार और सामुदायिक सहभागिता को प्राथमिकता दी जाएगी।
बैगा-गुनिया, मितानिन, आशा कार्यकर्ता, एएनएम और स्वास्थ्य विभाग की संयुक्त टीम इसी समर्पण के साथ कार्य करती रहेगी ताकि बस्तर को मलेरिया मुक्त बनाने का लक्ष्य जल्द से जल्द हासिल किया जा सके।
बस्तर की यह कहानी बताती है कि जब आधुनिक स्वास्थ्य सेवाएं स्थानीय परंपराओं और समुदाय के विश्वास के साथ जुड़ती हैं, तब बड़े से बड़ा बदलाव संभव हो जाता है। बैगा-गुनिया, मितानिन और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की मेहनत ने यह साबित किया है कि बीमारी से लड़ाई केवल अस्पतालों में नहीं, बल्कि गांवों की चौपाल, घर-घर की जागरूकता और लोगों की सहभागिता से जीती जाती है। मलेरिया के मामलों में आई 83 प्रतिशत की कमी इसी सामूहिक प्रयास और सतत जनजागरण का परिणाम है।
