पूर्व केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम के नक्सलवाद संबंधी कथित बयान पर बस्तर शांति समिति ने कड़ी आपत्ति जताते हुए सार्वजनिक माफी की मांग की है। समिति का कहना है कि ऐसे बयान नक्सली हिंसा से प्रभावित परिवारों की भावनाओं को आहत करते हैं। पढ़िए पूरी खबर।
रायपुर (वंदे छत्तीसगढ़ मीडिया)। पूर्व केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम के नक्सलवाद से जुड़े कथित बयान को लेकर छत्तीसगढ़ में राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर प्रतिक्रियाओं का दौर तेज हो गया है। इस बीच बस्तर शांति समिति ने भी इस मुद्दे पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराते हुए चिदंबरम से सार्वजनिक रूप से माफी मांगने की मांग की है। समिति का कहना है कि बस्तर के लोगों ने वर्षों तक नक्सली हिंसा का दर्द झेला है और ऐसे संवेदनशील विषयों पर किसी भी सार्वजनिक टिप्पणी में पीड़ितों की भावनाओं का सम्मान किया जाना चाहिए।
रायपुर में आयोजित एक प्रेसवार्ता में समिति के सदस्यों ने कहा कि बस्तर की धरती लंबे समय तक नक्सली हिंसा, भय और असुरक्षा का केंद्र रही है। इस हिंसा के कारण हजारों परिवारों का जीवन प्रभावित हुआ, कई लोगों ने अपने परिजनों को खोया और अनेक गांव विकास की मुख्यधारा से वर्षों तक दूर रहे। ऐसे में यदि कोई सार्वजनिक बयान उन घावों को फिर से कुरेदता है, तो यह पीड़ित परिवारों के लिए अत्यंत पीड़ादायक होता है।
‘बस्तर का दर्द केवल आंकड़ों से नहीं समझा जा सकता’
समिति के प्रतिनिधियों ने कहा कि नक्सलवाद पर चर्चा केवल राजनीतिक दृष्टिकोण से नहीं की जानी चाहिए। यह विषय हजारों परिवारों की जिंदगी से जुड़ा हुआ है। जिन लोगों ने अपनों को खोया है, विस्थापन झेला है या वर्षों तक भय के माहौल में जीवन बिताया है, वे इस पीड़ा को आज भी महसूस करते हैं।
उन्होंने कहा कि बस्तर का दर्द किसी रिपोर्ट या आंकड़ों तक सीमित नहीं है। यह उन परिवारों की वास्तविक कहानी है, जिनकी जिंदगी हिंसा के कारण पूरी तरह बदल गई। इसलिए इस विषय पर बोलते समय हर जिम्मेदार व्यक्ति को शब्दों का चयन बेहद सोच-समझकर करना चाहिए।
सार्वजनिक माफी की उठी मांग

बस्तर शांति समिति ने कहा कि यदि किसी बयान से समाज के एक बड़े वर्ग की भावनाएं आहत होती हैं, तो सार्वजनिक जीवन में रहने वाले व्यक्ति की जिम्मेदारी बनती है कि वह स्थिति स्पष्ट करे और आवश्यक होने पर माफी भी मांगे।
समिति के अनुसार, उनका उद्देश्य किसी राजनीतिक विवाद को बढ़ाना नहीं है, बल्कि उन लोगों की भावनाओं की रक्षा करना है जिन्होंने वर्षों तक हिंसा का सामना किया है। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक जीवन में रहने वाले नेताओं के शब्दों का व्यापक प्रभाव पड़ता है, इसलिए संवेदनशील मुद्दों पर विशेष सावधानी अपेक्षित होती है।
‘बदल रहा है बस्तर, शांति और विकास की नई तस्वीर उभर रही’
समिति ने प्रेसवार्ता के दौरान यह भी कहा कि पिछले कुछ वर्षों में बस्तर में शांति, शिक्षा, सड़क, स्वास्थ्य और रोजगार के क्षेत्र में सकारात्मक बदलाव देखने को मिले हैं। अनेक गांवों तक सड़कें पहुंची हैं, स्कूलों और स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार हुआ है तथा सरकारी योजनाओं का लाभ लोगों तक पहुंचने लगा है।
समिति का कहना है कि लंबे संघर्ष के बाद क्षेत्र में सामान्य जीवन की वापसी की उम्मीद मजबूत हुई है। ऐसे समय में ऐसे बयान, जो पुराने घावों को फिर से ताजा करें, समाज में अनावश्यक विवाद और असहजता पैदा कर सकते हैं।
पीड़ित परिवारों का सम्मान सबसे बड़ी प्राथमिकता
बस्तर शांति समिति ने कहा कि नक्सली हिंसा केवल सुरक्षा एजेंसियों या सरकारों का विषय नहीं रही, बल्कि इसका सबसे अधिक असर आम नागरिकों पर पड़ा। ग्रामीण, आदिवासी परिवार, बच्चे, महिलाएं और स्थानीय समुदाय वर्षों तक इसके दुष्प्रभाव झेलते रहे।
समिति ने कहा कि किसी भी चर्चा के केंद्र में सबसे पहले उन पीड़ित परिवारों का सम्मान होना चाहिए जिन्होंने अपने प्रियजनों को खोया है। उनकी पीड़ा को कमतर आंकने या उसकी अनदेखी करने वाला कोई भी बयान समाज में सकारात्मक संदेश नहीं देता।
संवेदनशील विषयों पर जिम्मेदारी की जरूरत
समिति के सदस्यों ने कहा कि लोकतंत्र में सभी को अपनी बात रखने का अधिकार है, लेकिन जब विषय नक्सलवाद जैसे गंभीर और संवेदनशील मुद्दे से जुड़ा हो, तब भाषा और अभिव्यक्ति दोनों में जिम्मेदारी आवश्यक हो जाती है।
उन्होंने कहा कि नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों को ऐसे विषयों पर बोलते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि उनके शब्दों का असर सीधे उन लोगों पर पड़ता है, जिन्होंने हिंसा का दर्द स्वयं महसूस किया है।
समाज में शांति बनाए रखने की अपील
बस्तर शांति समिति ने लोगों से भी अपील की कि इस पूरे मामले को शांति और संयम के साथ देखा जाए। समिति ने कहा कि बस्तर अब विकास, शिक्षा और रोजगार की दिशा में आगे बढ़ रहा है और समाज को विभाजित करने वाली किसी भी परिस्थिति से बचना चाहिए।
समिति ने दोहराया कि उनकी मांग केवल इतनी है कि जिन लोगों की भावनाएं आहत हुई हैं, उनका सम्मान किया जाए और यदि किसी बयान से भ्रम या पीड़ा उत्पन्न हुई है तो उसे स्पष्ट करते हुए सार्वजनिक रूप से माफी मांगी जाए।
बस्तर शांति समिति की यह प्रतिक्रिया इस बात को रेखांकित करती है कि नक्सलवाद केवल राजनीतिक बहस का विषय नहीं, बल्कि हजारों परिवारों के जीवन से जुड़ा संवेदनशील मुद्दा है। समिति का मानना है कि बस्तर ने लंबे संघर्ष के बाद शांति और विकास की दिशा में कदम बढ़ाए हैं और ऐसे समय में सभी जिम्मेदार व्यक्तियों को अपने सार्वजनिक बयानों में संवेदनशीलता, संतुलन और सामाजिक जिम्मेदारी का परिचय देना चाहिए। समिति ने स्पष्ट किया कि उनकी मांग किसी राजनीतिक विवाद से प्रेरित नहीं, बल्कि नक्सली हिंसा से प्रभावित लोगों की भावनाओं के सम्मान और सामाजिक सौहार्द को बनाए रखने की भावना से जुड़ी हुई है।
