ग्राम लात के ग्रामीणों को 15 साल बाद बड़ी कानूनी राहत। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने SECL की अपील खारिज कर पुनर्वास नीति 2007 के तहत रोजगार के दावों को मजबूती दी। जानिए पूरा मामला और फैसले का महत्व।
धरमजयगढ़ (वंदे छत्तीसगढ़ मीडिया)। करीब डेढ़ दशक से अपने अधिकारों और रोजगार की मांग को लेकर संघर्ष कर रहे धरमजयगढ़ विधानसभा क्षेत्र के ग्राम लात के ग्रामीणों के लिए आखिरकार न्यायपालिका से बड़ी राहत की खबर सामने आई है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 11 अगस्त 2026 को दक्षिण पूर्वी कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL) द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया है। इस फैसले के बाद उन ग्रामीणों की उम्मीदें फिर से मजबूत हो गई हैं, जो वर्ष 2009 में भूमि अधिग्रहण के दौरान रोजगार के वादे के पूरा होने का इंतजार कर रहे हैं।
हाईकोर्ट का यह फैसला केवल ग्राम लात तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे प्रदेश के उन हजारों भू-विस्थापित परिवारों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जो वर्षों से पुनर्वास, रोजगार और अपने अधिकारों के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं।
वर्ष 2009 में हुआ था भूमि अधिग्रहण
मामले की शुरुआत वर्ष 2009 में हुई थी, जब कोयला परियोजना के विस्तार के लिए ग्राम लात की भूमि का अधिग्रहण किया गया। उस समय ग्रामीणों को आश्वासन दिया गया था कि जिन परिवारों की जमीन परियोजना के लिए ली जाएगी, उन्हें पुनर्वास नीति के तहत रोजगार सहित अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी।
ग्रामीणों का आरोप था कि भूमि अधिग्रहण तो कर लिया गया, लेकिन रोजगार देने का वादा वर्षों तक पूरा नहीं किया गया। इसके बाद प्रभावित परिवारों ने प्रशासन और SECL के समक्ष कई बार अपनी मांग रखी, लेकिन समाधान नहीं निकलने पर मामला न्यायालय पहुंचा।
पुनर्वास नीति 2007 बनी कानूनी आधार
मामले की सुनवाई के दौरान पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन नीति-2007 महत्वपूर्ण आधार बनी। इस नीति में पात्र भू-विस्थापित परिवारों को रोजगार या अन्य वैकल्पिक लाभ उपलब्ध कराने का प्रावधान है।
हाईकोर्ट ने पहले भी इस मामले में स्पष्ट निर्देश देते हुए कहा था कि पात्र ग्रामीणों के रोजगार संबंधी दावों पर 45 दिनों के भीतर निर्णय लिया जाए।
हालांकि, इस आदेश के बाद भी मामला पूरी तरह आगे नहीं बढ़ पाया। इसके बाद SECL ने आदेश में संशोधन की मांग की और बाद में अपील भी दायर की।
हाईकोर्ट ने अपील भी कर दी खारिज
ताजा सुनवाई में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने SECL की अपील को खारिज करते हुए पूर्व आदेश को बरकरार रखा। अदालत के इस फैसले के बाद अब रोजगार संबंधी दावों पर आगे की कार्रवाई का रास्ता और अधिक स्पष्ट हो गया है।
कानूनी जानकारों का मानना है कि अदालत के इस निर्णय से यह संदेश भी गया है कि यदि किसी परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहित की जाती है, तो प्रभावित परिवारों के अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती।
ग्रामीणों में खुशी का माहौल
फैसले की जानकारी मिलते ही ग्राम लात में खुशी का माहौल देखा गया। लंबे समय से संघर्ष कर रहे ग्रामीणों ने इसे न्याय की जीत बताया।
ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने वर्षों तक प्रशासनिक कार्यालयों के चक्कर लगाए, ज्ञापन दिए और न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। अब हाईकोर्ट के फैसले के बाद उन्हें उम्मीद है कि रोजगार संबंधी प्रक्रिया जल्द पूरी होगी और प्रभावित परिवारों को उनका अधिकार मिलेगा।
ग्रामीणों ने यह भी कहा कि उनका संघर्ष केवल रोजगार के लिए नहीं था, बल्कि उन वादों को पूरा कराने के लिए था जो भूमि अधिग्रहण के समय किए गए थे।
अन्य भू-विस्थापित परिवारों के लिए भी मिसाल
विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला केवल ग्राम लात के लिए नहीं बल्कि उन सभी क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण है, जहां औद्योगिक, खनन या अन्य विकास परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण किया गया है।
यदि किसी परियोजना के दौरान पुनर्वास नीति के तहत रोजगार या अन्य लाभ देने का वादा किया गया है, तो संबंधित संस्थाओं की जिम्मेदारी बनती है कि वे समयबद्ध तरीके से उसे पूरा करें।
इस निर्णय से भविष्य में ऐसे मामलों में प्रभावित परिवारों को कानूनी आधार मिलने की संभावना भी बढ़ सकती है।
विकास और अधिकारों के बीच संतुलन जरूरी
विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी विकास परियोजना का उद्देश्य केवल आर्थिक प्रगति नहीं होना चाहिए, बल्कि उससे प्रभावित लोगों के जीवन और आजीविका की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
भूमि अधिग्रहण के बाद यदि प्रभावित परिवारों को समय पर पुनर्वास और रोजगार नहीं मिलता, तो सामाजिक और आर्थिक समस्याएं बढ़ती हैं। ऐसे में न्यायालयों की भूमिका यह सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण होती है कि विकास और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन बना रहे।
अब आगे क्या?
हाईकोर्ट द्वारा SECL की अपील खारिज किए जाने के बाद अब सभी की निगाहें इस बात पर हैं कि संबंधित अधिकारियों द्वारा अदालत के निर्देशों का पालन कितनी शीघ्रता से किया जाता है।
यदि पात्र ग्रामीणों के दावों का समयबद्ध परीक्षण कर रोजगार संबंधी निर्णय लिए जाते हैं, तो वर्षों से लंबित यह विवाद समाप्त होने की दिशा में आगे बढ़ सकता है। ग्राम लात के लोगों का कहना है कि वे अब केवल आदेश का इंतजार नहीं, बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन की उम्मीद कर रहे हैं।करीब 15 वर्षों तक चले संघर्ष के बाद ग्राम लात के ग्रामीणों को मिली यह कानूनी राहत न्याय व्यवस्था में विश्वास को और मजबूत करती है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का फैसला यह स्पष्ट संदेश देता है कि भूमि अधिग्रहण के दौरान किए गए वादों और पुनर्वास नीति के प्रावधानों की अनदेखी नहीं की जा सकती। अब सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संबंधित एजेंसियों की है कि वे अदालत के निर्देशों का सम्मान करते हुए पात्र ग्रामीणों को शीघ्र न्याय और रोजगार उपलब्ध कराने की दिशा में ठोस कदम उठाएं। यदि ऐसा होता है तो यह फैसला केवल एक गांव की जीत नहीं, बल्कि प्रदेश के हजारों भू-विस्थापित परिवारों के अधिकारों की लड़ाई में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित होगा।
