विश्व आदिवासी दिवस 2026 पर कोरबा की विश्व की प्रथम आदिवासी शक्तिपीठ में आयोजित तीन दिवसीय कार्यक्रम के दूसरे दिन राज्य स्तरीय कबड्डी प्रतियोगिता, तीरंदाजी, सांस्कृतिक प्रस्तुतियां, स्लोगन, निबंध और लेखन प्रतियोगिताओं का आयोजन हुआ। जानिए इस आयोजन की पूरी रिपोर्ट।
कोरबा (वंदे छत्तीसगढ़ मीडिया)। विश्व आदिवासी दिवस (मूल निवासी दिवस) के अवसर पर कोरबा के बुधवारी बाजार स्थित विश्व की प्रथम आदिवासी शक्तिपीठ में आयोजित तीन दिवसीय कार्यक्रम पूरे उत्साह और उल्लास के साथ आगे बढ़ रहा है। आयोजन का दूसरा दिन खेल, संस्कृति, परंपरा और सामाजिक जागरूकता के नाम रहा। राज्य के विभिन्न जिलों से पहुंचे खिलाड़ियों की मौजूदगी में राज्य स्तरीय कबड्डी प्रतियोगिता का शानदार शुभारंभ हुआ, जहां खिलाड़ियों ने अपने दमदार प्रदर्शन से दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया।
यह आयोजन केवल एक उत्सव तक सीमित नहीं है, बल्कि आदिवासी समाज की सांस्कृतिक विरासत, ऐतिहासिक योगदान, संवैधानिक अधिकारों और युवा प्रतिभाओं को एक साझा मंच प्रदान करने का महत्वपूर्ण प्रयास बनकर उभर रहा है। बड़ी संख्या में समाज के लोग, खिलाड़ी, छात्र-छात्राएं, महिलाएं और बुद्धिजीवी इस आयोजन में भाग लेकर इसकी गरिमा बढ़ा रहे हैं।
खेल मैदान में दिखा खिलाड़ियों का जोश
कार्यक्रम के दूसरे दिन आयोजित राज्य स्तरीय कबड्डी प्रतियोगिता सबसे बड़ा आकर्षण रही। प्रतियोगिता में प्रदेश के विभिन्न जिलों और क्षेत्रों से आई टीमों ने हिस्सा लिया। मैदान में खिलाड़ियों ने बेहतरीन तालमेल, अनुशासन और खेल भावना का परिचय देते हुए रोमांचक मुकाबले खेले।
दर्शकों ने भी खिलाड़ियों का उत्साहवर्धन करते हुए तालियों और नारों से पूरा मैदान गुंजायमान कर दिया। आयोजकों का कहना है कि खेल प्रतियोगिताओं का उद्देश्य केवल जीत-हार तय करना नहीं, बल्कि आदिवासी युवाओं में खेल प्रतिभा को पहचान देना और उन्हें बड़े मंचों तक पहुंचाने के लिए प्रेरित करना भी है।
आदिवासी प्रतिभाओं को मिल रहा है व्यापक मंच

तीन दिवसीय कार्यक्रम में केवल खेल ही नहीं बल्कि बौद्धिक और रचनात्मक गतिविधियों को भी विशेष महत्व दिया गया है। इसी उद्देश्य से राज्य स्तरीय स्लोगन लेखन, निबंध लेखन एवं लेख प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया है।
इन प्रतियोगिताओं के विषय आदिवासी समाज के इतिहास, परंपराओं, संस्कृति, संवैधानिक अधिकारों, सामाजिक योगदान और समकालीन चुनौतियों से जुड़े हुए हैं। प्रतियोगिताओं में शामिल प्रतिभागी अपने विचारों के माध्यम से समाज की विरासत और वर्तमान परिस्थितियों को अभिव्यक्त कर रहे हैं।
आयोजकों का मानना है कि युवा पीढ़ी को अपने इतिहास और अधिकारों की जानकारी देना समय की आवश्यकता है, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी सांस्कृतिक पहचान को मजबूत बनाए रख सकें।
विशेषज्ञों ने किया महत्वपूर्ण विषयों पर मार्गदर्शन
कार्यक्रम के दौरान विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों द्वारा व्याख्यान और मार्गदर्शन सत्र भी आयोजित किए जा रहे हैं। इन सत्रों में महान आदिवासी वीर-योद्धाओं के संघर्ष, आदिवासी समाज की परंपराएं, भारतीय संविधान में प्रदत्त अधिकार, अनुसूचित जनजातियों के संरक्षण संबंधी प्रावधान तथा सामाजिक विकास जैसे विषयों पर विस्तार से जानकारी दी जा रही है।
विशेषज्ञों ने युवाओं से अपील की कि वे आधुनिक शिक्षा और तकनीक के साथ अपनी सांस्कृतिक जड़ों से भी जुड़े रहें। उनका कहना था कि समाज की प्रगति तभी संभव है जब विकास और परंपरा दोनों साथ-साथ आगे बढ़ें।
तीरंदाजी प्रतियोगिता बनी आकर्षण का केंद्र
आदिवासी समाज की पारंपरिक खेल संस्कृति को जीवंत रखने के उद्देश्य से तीरंदाजी प्रतियोगिता का भी आयोजन किया गया है। तीरंदाजी आदिवासी जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है और आज भी कई क्षेत्रों में यह पारंपरिक कौशल के रूप में संरक्षित है।
प्रतियोगिता में प्रतिभागियों ने शानदार निशानेबाजी का प्रदर्शन किया। इस दौरान बड़ी संख्या में लोगों ने प्रतियोगिता का आनंद लिया और खिलाड़ियों का उत्साह बढ़ाया।
महिलाओं की सक्रिय भागीदारी ने बढ़ाई आयोजन की गरिमा
इस आयोजन में महिलाओं के लिए भी विशेष प्रतियोगिताएं आयोजित की गई हैं। मेहंदी एवं रंगोली प्रतियोगिता में महिलाओं और युवतियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। पारंपरिक आदिवासी कला, प्राकृतिक रंगों और सांस्कृतिक प्रतीकों पर आधारित सुंदर रचनाओं ने सभी का ध्यान आकर्षित किया।
इन प्रतियोगिताओं का उद्देश्य महिलाओं की रचनात्मक प्रतिभा को मंच देना और सांस्कृतिक परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाना है।
सांस्कृतिक प्रस्तुतियों में दिखी आदिवासी विरासत की झलक
शाम होते ही आयोजन स्थल पूरी तरह सांस्कृतिक रंगों में रंग गया। पारंपरिक वेशभूषा में सजे कलाकारों ने लोकनृत्य, लोकगीत और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से आदिवासी समाज की समृद्ध विरासत को जीवंत कर दिया।
ढोल, मांदर और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की मधुर धुनों पर प्रस्तुत नृत्यों ने उपस्थित लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया। कार्यक्रम में युवा कलाकारों के साथ वरिष्ठ लोक कलाकारों ने भी अपनी प्रस्तुतियां देकर सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने का संदेश दिया।
आयोजन का उद्देश्य केवल उत्सव नहीं, सामाजिक जागरूकता भी
आयोजकों का कहना है कि विश्व आदिवासी दिवस का यह आयोजन केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं है। इसका उद्देश्य समाज में शिक्षा, खेल, संस्कृति, सामाजिक एकता और संवैधानिक जागरूकता को बढ़ावा देना भी है।
आयोजन के माध्यम से युवाओं को यह संदेश दिया जा रहा है कि वे अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान पर गर्व करें तथा आधुनिक शिक्षा और खेलों में भी उत्कृष्ट प्रदर्शन कर समाज और प्रदेश का नाम रोशन करें।
कोरबा में बन रहा है आदिवासी एकता का सशक्त मंच
विश्व की प्रथम आदिवासी शक्तिपीठ में आयोजित यह तीन दिवसीय कार्यक्रम प्रदेशभर के आदिवासी समाज को एक मंच पर जोड़ने का कार्य कर रहा है। यहां विभिन्न जिलों से पहुंचे प्रतिभागियों और सामाजिक प्रतिनिधियों के बीच संवाद, विचार-विमर्श और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का अवसर भी मिल रहा है।
समाज के वरिष्ठजनों का मानना है कि ऐसे आयोजन न केवल सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करते हैं बल्कि नई पीढ़ी को अपनी पहचान और इतिहास से जोड़ने का कार्य भी करते हैं।
समापन दिवस पर रहेंगी विशेष गतिविधियां
आयोजकों के अनुसार कार्यक्रम के अंतिम दिन विभिन्न प्रतियोगिताओं के विजेताओं का सम्मान किया जाएगा। साथ ही सांस्कृतिक प्रस्तुतियों, सामाजिक संदेशों और समाज के उत्कृष्ट प्रतिभागियों को सम्मानित कर आयोजन का समापन किया जाएगा।
विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर कोरबा में आयोजित यह आयोजन अब केवल एक वार्षिक समारोह नहीं रह गया है, बल्कि खेल, शिक्षा, संस्कृति, सामाजिक जागरूकता और आदिवासी अस्मिता को एक साथ आगे बढ़ाने वाला एक व्यापक जनआंदोलन बनता दिखाई दे रहा है।
