छत्तीसगढ़ के प्रमुख लोकगीत मन के संपूर्ण जानकारी पढ़व। सुआ, ददरिया, भोजली, पंथी, राउत नाचा, फाग, कर्मा अउ बारहमासा जइसने लोकगीत मन कऊन मौसम मं गाए जाथें, जानव छत्तीसगढ़ी भाखा मं विस्तृत लेख।
रायपुर (वंदे छत्तीसगढ़ मीडिया)। छत्तीसगढ़ ला अकारण “लोक संस्कृति के गढ़” नइ कहे जाथे। इहां के माटी, खेत-खार, नदी-नाला अउ गांव-गंवई के जिनगी मं लोकगीत रचे-बसे हवंय। ए प्रदेश के लोकगीत सिरिफ गाना नइ, बल्कि पीढ़ी दर पीढ़ी चले आथें संस्कृति, परंपरा अउ भावनात्मक जुड़ाव के पहचान हवंय। मौसम बदले के संग-संग गीत घलो बदल जाथें। सावन के रिमझिम होवय, धान रोपई के बेरा होवय, नवरात्रि के भक्ति होवय या फागुन के उमंग, हर ऋतु के अपन अलग सुर अउ अपन अलग पहचान हे।
आज घलो गांव मं जऊन बखत दाई-बहिनी मन समूह मं बइठके सुआ गीत गाथें या किसान मन धान रोपत-रोपत ददरिया छेड़ देथें, त लगथे जइसे छत्तीसगढ़ के माटी खुद अपन कहानी सुना रहल होवय।
सावन-भादो: मया, बिरहा अउ खेती के गीत
बरसात के दिन छत्तीसगढ़ के लोकजीवन बर सबसे महत्वपूर्ण समय आय। ए बेरा खेती-किसानी के संग-संग गीत मन घलो खेत ले गांव तक गूंजत रहिथें।
सुआ गीत – तीजा के मया अउ बिरहा के स्वर
तीजा ले दशहरा तक खासकर भादो महीना मं महिलामन मिट्टी के सुआ (सुग्गा) ला बीच मं रखके रातभर सुआ गीत गाथें। ए गीत मं नवविवाहित बहिनी अपन मया, पीरा, बिरहा अउ मन के भाव ला सुआ के माध्यम ले व्यक्त करथे। तीजा के पर्व मं आज घलो गांव-गांव सुआ नाचा संस्कृति के महत्वपूर्ण हिस्सा बने हुए हे।
ददरिया – मेहनत मं घुला मया के गीत
धान रोपई अउ निंदाई के बखत खेत मं गूंजे वाला ददरिया छत्तीसगढ़ के सबसे लोकप्रिय लोकगीत मन मं गिने जाथे। ए गीत सवाल-जवाब के शैली मं गाए जाथे। एक टोली गाथे त दूसर टोली ओकर जवाब देथे। ददरिया मेहनत के थकान ला कम करथे अउ गांव के जिनगी मं प्रेम अउ अपनापन के रंग भर देथे।
भोजली गीत – समृद्धि अउ दोस्ती के परंपरा
सावन शुक्ल नवमी ले पूर्णिमा तक महिलामन भोजली बोके ओकर पूजा करथें। सात दिन बाद नदी या तालाब मं विसर्जन करे के समय भोजली गीत गाए जाथे। ए गीत मं भरपूर फसल, परिवार के सुख-समृद्धि अउ संतान के मंगल कामना करे जाथे। भोजली के एक खास बात ए घलो हे कि ए पर्व मं लइकी मन “भोजली सहेली” बनाके अपन दोस्ती ला जिनगी भर निभाथें।
क्वार-कार्तिक: भक्ति अउ आस्था के लोकधुन
बरसात बीततेच गांव-गांव मं देवी-देवता के आराधना सुरू हो जाथे।
जसगीत – देवी भक्ति के सुर
नवरात्रि के समय जसगीत के गूंज पूरा छत्तीसगढ़ मं सुनई देथे। गांव-गांव जस मंडली बनथे अउ देवी, राम अउ कृष्ण के महिमा गाए जाथे। बस्तर ले सरगुजा तक जसगीत सिरिफ भक्ति तक सीमित नइ, बल्कि समाज ला एकजुट करे के माध्यम घलो आय।
पंथी गीत – समानता के संदेश
सतनामी समाज के पहचान बने पंथी गीत गुरु घासीदास बाबा के उपदेश मन ला जन-जन तक पहुंचाथे। सफेद कपड़ा पहिरे कलाकार गोल घेरा बनाके पंथी नृत्य करथें अउ सतनाम के संदेश गाथें। ए गीत समाज मं समानता, भाईचारा अउ भेदभाव के विरोध के प्रेरणा देथे।
अगहन-पूस: धान कटनी अउ मड़ई के उमंग
धान के कटनी के बाद गांव मं खुशहाली के माहौल बन जाथे।
राउत नाचा – गोठान संस्कृति के पहचान
दीपावली के बाद यादव समाज के राउत नर्तक पारंपरिक वेशभूषा मं गांव-गांव घूमके राउत नाचा करथें। लाठी, घुंघरू अउ दोहा के संग भगवान कृष्ण के जीवन के गाथा गाए जाथे। ए लोकनृत्य आज छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक पहचान बन चुके हे।
धनकुल गीत – मेहनत के उत्सव
धान मिंजाई के समय महिलामन धनकुल गीत गाथें। ए गीत मं मेहनत, खुशहाली अउ लक्ष्मी स्वरूप धान के सम्मान के भावना साफ झलकथे। काम के बीच गाए जाथे ए गीत माहौल ला उत्सव मं बदल देथे।
माघ-फागुन: रंग, प्रेम अउ बियाह के गीत
फाग गीत – रंग अउ उमंग के त्योहार
वसंत पंचमी ले होली तक गांव के चौपाल मं फाग गीत गूंजथे। पुरुष अउ महिलामन मिलके फाग गाथें अउ डंडा नाच करथें। प्रेम, हास्य अउ रंग के संग फाग गीत गांव के माहौल ला जीवंत बना देथे।
शादी-बियाह के सुआ गीत
माघ-फागुन के लगन मं बेटी विदाई के समय सुआ गीत के अलग रूप सुनई देथे। ए गीत मं बेटी ला ससुराल के जिनगी बर सीख, आशीर्वाद अउ भावुक संदेश दे जाथे।
भड़ौनी गीत – हंसी-मजाक के रस्म
शादी के बाद समधी-समधन के बीच हंसी-ठिठोली वाले भड़ौनी गीत गाए जाथें। ए गीत दू परिवार के बीच अपनापन बढ़ाए के सुंदर परंपरा आय।
चैत-बैसाख-जेठ: प्रकृति, देव अउ परंपरा
कर्मा गीत – प्रकृति पूजा के मिसाल
सरगुजा अउ जशपुर अंचल मं कर्मा गीत के विशेष महत्व हे। करम डार के पूजा कर रातभर नाच-गान होथे। ए गीत भाई-बहिनी के प्रेम, प्रकृति संरक्षण अउ भरपूर फसल के कामना के प्रतीक आय।
डोमकच गीत
बियाह के समय महिलामन रात मं डोमकच गीत गाथें। ए गीत महिलामन के मन के भाव, हास-परिहास अउ सामाजिक अपनापन ला अभिव्यक्त करथे।
गौरा-गौरी गीत
शिव-पार्वती के विवाह के कथा ऊपर आधारित गौरा-गौरी गीत दाम्पत्य प्रेम अउ पारिवारिक सुख-शांति के संदेश देथे। गांव मं आज घलो ए परंपरा बड़े श्रद्धा ले निभाए जाथे।
बारहमासा – बारा महीना के भावनात्मक सफर
बारहमासा लोकगीत मं एक विरहिणी अपन पिया के बिछोह ला बारा महीना के माध्यम ले व्यक्त करथे। सावन, भादो, कार्तिक, माघ हर महीना अपन अलग भावना ले भरपूर रहिथे। ए शैली छत्तीसगढ़ी लोक साहित्य के अनमोल धरोहर माने जाथे।
आधुनिक मंच मं घलो जिंदा हे लोकगीत
आज सोशल मीडिया अउ डिजिटल मंच के जमाना मं घलो छत्तीसगढ़ी लोकगीत के लोकप्रियता कम नइ होय हे। पंडवानी, भरथरी, सुआ, ददरिया अउ पंथी जइसने लोकधुन अब यूट्यूब, सोशल मीडिया अउ सांस्कृतिक मंच मन मं लाखों लोगन तक पहुंचत हवंय। युवा कलाकार मन अपन पारंपरिक गीत ला नवा अंदाज मं दुनिया भर तक पहुंचावत हवंय।
लोकगीत के संरक्षण मं सरकार अउ समाज के भूमिका
आकाशवाणी रायपुर ले रोज प्रसारित होवत छत्तीसगढ़ी लोकगीत, राष्ट्रीय आदिवासी नृत्य महोत्सव, गढ़ कलेवा के सांस्कृतिक संध्या अउ स्कूल पाठ्यक्रम मं लोकगीत के समावेश ए बात के प्रमाण आय कि छत्तीसगढ़ अपन सांस्कृतिक विरासत ला सहेजे बर लगातार प्रयासरत हे। समाज अउ नई पीढ़ी के भागीदारी ले ए परंपरा अउ मजबूत होवत जात हे।
माटी के सुर ला बचाय रखना सबके जिम्मेदारी
छत्तीसगढ़ के लोकगीत सिरिफ संगीत नइ हवंय, बल्कि ए प्रदेश के आत्मा हवंय। ददरिया मं किसान के मेहनत, सुआ मं बेटी के मया, पंथी मं समानता के संदेश, राउत नाचा मं परंपरा अउ फाग मं जीवन के रंग समाए हवय।
आज भलेच डीजे अउ आधुनिक संगीत के दौर चलत होवय, फेर गांव के कोनो दाई जब “सुआ रे सुआ” के सुर छेड़थे, त लगथे जइसे माटी खुद बोलत होवय। ए लोकगीत मन ला बचाय रखना सिरिफ कलाकार मन के जिम्मेदारी नइ, बल्कि हम सबके सांस्कृतिक फर्ज आय। जऊन समाज अपन लोकगीत ला संजोके रखथे, ओही समाज अपन पहचान अउ इतिहास ला आने वाला पीढ़ी बर सुरक्षित रख पाथे।
