धार, १७ मई ।
बहुचर्चित भोजशाला परिसर में शनिवार का दिन लंबे समय बाद एक अलग ही भावनात्मक, धार्मिक और ऐतिहासिक वातावरण का साक्षी बना।मध्य प्रदेश हाई कोर्ट द्वारा भोजशाला को वाग्देवी मंदिर मानते हुए शुक्रवार को दिए महत्वपूर्ण फैसले के अगले दिन सुबह से श्रद्धालुओं और भोजशाला मुक्ति आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं का यहां पहुंचना शुरू हो गया। शाम तक परिसर के बाहर और भीतर लोगों की आवाजाही बनी रही। श्रद्धालु निर्धारित शुल्क (एक रुपया प्रति व्यक्ति) देकर परिसर में प्रवेश करते रहे और मां वाग्देवी की प्रतिमा के स्थान पर पहुंचकर श्रद्धा, आस्था और भावुकता के साथ नमन करते दिखाई दिए। सुबह जैसे ही भोजशाला के द्वार खुले, वैसे ही परिसर के बाहर श्रद्धालुओं का उत्साह साफ दिखाई देने लगा। कई महिलाएं मां सरस्वती और भगवान हनुमान के चित्र लेकर पहुंची थीं लेकिन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के सुरक्षाकर्मियों ने नियमों का हवाला देकर उन्हें रोक दिया।श्रद्धालुओं ने परिसर में हनुमान चालीसा का पाठ किया। दरअसल, अभी तक भोजशाला में हिंदू पक्ष को मंगलवार को पूजा की अनुमति थी। भोजशाला मुक्ति आंदोलन के लिए सत्याग्रह के रूप में हनुमान चालीसा का पाठ करने की परंपरा बीते कई वर्षों में बन गई है।संघर्ष की हर पीड़ा निर्णय के साथ सार्थक हो गई मंदिर पक्ष में आए फैसले के बाद भोजशाला मुक्ति आंदोलन से जुड़े बुजुर्ग कार्यकर्ताओं और हिंदू समाज के वरिष्ठ लोगों की आंखों में संतोष, भावुकता और वर्षों के संघर्ष के बाद विजय की खुशी एक साथ दिखाई दी।90 वर्षीय हिंदू नेता विमल गोधा ने कहा कि उन्होंने अपने जीवन के कई दशक भोजशाला मुक्ति आंदोलन को समर्पित किए हैं। उन्होंने वह दौर भी देखा है, जब भोजशाला की बात उठाना ही संघर्ष माना जाता था। अब लगता है जैसे जीवन का सबसे बड़ा संकल्प पूरा हो गया हो।
आंदोलन से जुड़े रहे 75 वर्षीय सुरेशचंद्र भंडारी ने कहा कि यह आंदोलन सांस्कृतिक अस्मिता और इतिहास को बचाने की लड़ाई भी था। शुरुआती दौर में बहुत कम लोग खुलकर आंदोलन के साथ खड़े होते थे, लेकिन धीरे-धीरे यह जन आस्था का आंदोलन बन गया। अब ऐसा लग रहा है जैसे संघर्ष की हर पीड़ा सार्थक हो गई। हाई कोर्ट के निर्णय के बाद धार सांसद और केंद्रीय राज्यमंत्री सावित्री ठाकुर ने दावा किया है कि ब्रिटिश संग्रहालय वर्ष 2017-18 में ही प्रतिमा लौटाने पर सहमत हो गया था, लेकिन एक शर्त के कारण प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी थी।
सावित्री ठाकुर ने बताया कि वाग्देवी की प्रतिमा को वापस लाने के लिए तत्कालीन राज्यसभा सदस्य सुब्रमण्यम स्वामी केंद्र सरकार की ओर से ब्रिटिश म्यूजियम प्रबंधन से चर्चा कर रहे थे। वर्ष 2014 से 2017 के बीच सुब्रमण्यम स्वामी ने चार बार भोजशाला का दौरा भी किया था। सावित्री ठाकुर का कहना है कि वर्ष 2017-18 में ब्रिटिश म्यूजियम ने शर्त रखी थी कि वाग्देवी की प्रतिमा को उसी स्थान पर पुनस्र्थापित किया जाए, जहां पर वह पहले स्थापित थी। उस समय मामला हाई कोर्ट में लंबित होने के कारण यह शर्त पूरी नहीं हो सकी। हाई कोर्ट के ताजा आदेश के बाद प्रतिमा को भोजशाला में पुनस्र्थापित करने का मार्ग प्रशस्त हो गया है। वह स्वयं इस संबंध में केंद्रीय नेतृत्व से चर्चा करेंगी।
भोजशाला में लौटा आस्था का उल्लास मंदिर की मान्यता पर भावुक दिखे श्रद्धालु
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