कोरबा के कुदमुरा वन परिक्षेत्र के धोबनीमार गांव में हाथियों के झुंड ने आंगनबाड़ी केंद्र को क्षतिग्रस्त कर दिया। रेडी-टू-ईट और अनाज खा गए, खिड़की व सामान तोड़ा। बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होने पर प्रशासन ने वैकल्पिक व्यवस्था शुरू की।
कोरबा। (वंदे छत्तीसगढ़ मीडिया) छत्तीसगढ़ में मानव और हाथियों के बीच बढ़ते संघर्ष को रोकने के लिए शासन और वन विभाग लगातार प्रयास करने का दावा कर रहे हैं, लेकिन जमीनी हालात अब भी चिंता बढ़ाने वाले हैं। कोरबा जिले में हाथियों का दल एक बार फिर आबादी वाले क्षेत्र में पहुंच गया और इस बार उसका निशाना मासूम बच्चों के लिए संचालित आंगनबाड़ी केंद्र बना। हाथियों ने केंद्र की खिड़की तोड़कर भीतर रखे बच्चों के पोषण आहार, रेडी-टू-ईट और खाद्यान्न को खा लिया, वहीं केंद्र में रखे कई जरूरी सामान को भी नुकसान पहुंचाया। इस घटना के बाद बच्चों की नियमित पढ़ाई और पोषण व्यवस्था पर अस्थायी रूप से संकट खड़ा हो गया है।
जानकारी के अनुसार, यह घटना कोरबा वनमंडल के कुदमुरा वन परिक्षेत्र अंतर्गत उरगा-हाटी राजमार्ग पर स्थित ग्राम पंचायत तौलीपाली के आश्रित ग्राम धोबनीमार की है। यहां संचालित आंगनबाड़ी केंद्र में तीन से छह वर्ष आयु वर्ग के 15 बच्चों तथा छह माह से तीन वर्ष तक के 12 नौनिहालों का पंजीयन है। प्रतिदिन यहां बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा के साथ-साथ पोषण आहार भी उपलब्ध कराया जाता है।
रात के अंधेरे में केंद्र में घुसे हाथी
बताया जा रहा है कि क्षेत्र में पिछले कई दिनों से लगभग 10 से 12 हाथियों का झुंड लगातार विचरण कर रहा है। शुक्रवार को रोजाना की तरह आंगनबाड़ी कार्यकर्ता गेंदबाई और सहायिका दीपा राठिया बच्चों की छुट्टी के बाद केंद्र बंद कर अपने घर चली गई थीं। रात के दौरान हाथियों का झुंड गांव के बाहर स्थित आंगनबाड़ी केंद्र तक पहुंच गया।
भोजन की तलाश में पहुंचे हाथियों ने केंद्र की पिछली ओर लगी खिड़की को तोड़ दिया और उसी रास्ते अंदर प्रवेश कर गए। भीतर रखे चावल, अन्य खाद्यान्न सामग्री और बच्चों के लिए सुरक्षित रखे गए रेडी-टू-ईट पोषण आहार को हाथियों ने पूरी तरह खा लिया। भोजन की तलाश में हाथियों ने केंद्र के भीतर रखे टीन के संदूक सहित अन्य सामान को भी क्षतिग्रस्त कर दिया।
सुबह ग्रामीणों ने देखा तब हुआ घटना का खुलासा
शनिवार सुबह जब ग्रामीणों की नजर आंगनबाड़ी केंद्र पर पड़ी तो वहां का नजारा देखकर सभी हैरान रह गए। केंद्र की टूटी खिड़की, बिखरा हुआ सामान, फैले हुए चावल और रेडी-टू-ईट के अवशेष देखकर स्पष्ट हो गया कि रात में हाथियों ने यहां जमकर उत्पात मचाया है।
ग्रामीणों ने तत्काल इसकी सूचना आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सहायिका को दी। दोनों मौके पर पहुंचीं तो देखा कि केंद्र के भीतर रखा अधिकांश सामान अस्त-व्यस्त पड़ा हुआ था और कई वस्तुएं पूरी तरह टूट चुकी थीं।
बच्चों की पढ़ाई और पोषण व्यवस्था पर असर
इस घटना से सबसे अधिक असर उन बच्चों पर पड़ा है जो रोजाना आंगनबाड़ी केंद्र पहुंचकर शिक्षा और पोषण आहार प्राप्त करते हैं। केंद्र क्षतिग्रस्त होने के कारण नियमित गतिविधियों के संचालन में परेशानी उत्पन्न हो गई है। ग्रामीणों का कहना है कि छोटे बच्चों के लिए आंगनबाड़ी केवल पढ़ाई का केंद्र नहीं, बल्कि पोषण और देखभाल का भी महत्वपूर्ण माध्यम है। ऐसे में केंद्र के क्षतिग्रस्त होने से अभिभावकों की चिंता बढ़ गई है।
प्रशासन ने शुरू की वैकल्पिक व्यवस्था
घटना की जानकारी मिलते ही आंगनबाड़ी कार्यकर्ता ने सेक्टर सुपरवाइजर हरा राठौर को पूरी स्थिति से अवगत कराया। इसके बाद संबंधित अधिकारियों को सूचना भेजी गई। अधिकारियों ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि किसी भी स्थिति में बच्चों की पढ़ाई और पोषण व्यवस्था बाधित नहीं होनी चाहिए।
जानकारी के अनुसार, गांव में ही एक किराए के मकान में अस्थायी रूप से आंगनबाड़ी केंद्र संचालित करने की तैयारी शुरू कर दी गई है, ताकि बच्चों की शिक्षा और पोषण कार्यक्रम नियमित रूप से जारी रह सके।
लगातार बढ़ रही हाथियों की आवाजाही
स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, पिछले कुछ समय से हाथियों का झुंड लगातार गांवों के आसपास देखा जा रहा है। खेतों, मकानों और सार्वजनिक भवनों में नुकसान की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। ग्रामीणों का कहना है कि वन विभाग की ओर से निगरानी तो की जा रही है, लेकिन हाथियों को आबादी वाले क्षेत्रों में प्रवेश करने से रोकने के लिए प्रभावी और स्थायी उपायों की आवश्यकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जंगलों में भोजन और पानी की कमी तथा प्राकृतिक आवासों में लगातार हो रहे बदलाव के कारण हाथी गांवों की ओर रुख कर रहे हैं। इससे मानव-हाथी संघर्ष की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं।
ग्रामीणों ने की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम की मांग
घटना के बाद ग्रामीणों ने वन विभाग और जिला प्रशासन से मांग की है कि हाथियों की गतिविधियों पर लगातार निगरानी रखी जाए और गांवों में समय रहते अलर्ट जारी किया जाए। साथ ही, सार्वजनिक संस्थानों, स्कूलों और आंगनबाड़ी केंद्रों की सुरक्षा के लिए विशेष इंतजाम किए जाएं ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं से बचा जा सके।
फिलहाल प्रशासन ने वैकल्पिक व्यवस्था शुरू कर बच्चों की पढ़ाई जारी रखने का निर्णय लिया है, लेकिन यह घटना एक बार फिर यह सवाल खड़ा करती है कि मानव-हाथी संघर्ष को रोकने के लिए केवल दावों से काम नहीं चलेगा। जंगल से सटे गांवों में रहने वाले लोगों और वहां पढ़ने वाले बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए दीर्घकालिक और प्रभावी रणनीति अपनाना समय की सबसे बड़ी जरूरत बन गई है।
