दंतेवाड़ा। छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल की पहचान सिर्फ घने जंगलों, पहाड़ियों और प्राकृतिक खूबसूरती तक सीमित नहीं है। यहां इतिहास, लोकविश्वास, आदिवासी संस्कृति और धार्मिक आस्था एक-दूसरे से इस तरह जुड़े हुए हैं कि कई स्थान अपने आप में एक पूरी कहानी बन जाते हैं। दंतेवाड़ा की बैलाडीला पर्वत श्रृंखला में स्थित ढोलकल गणेश ऐसा ही एक स्थल है, जहां करीब 3000 फीट की ऊंचाई पर पहाड़ी की चोटी में भगवान गणेश की प्राचीन पत्थर की प्रतिमा विराजमान है।
समुद्र तल से करीब 2994 फीट की ऊंचाई पर स्थित ढोलकल को दंतेवाड़ा जिला प्रशासन ने धार्मिक और प्राकृतिक पर्यटन स्थल के रूप में भी विकसित किया है। जिला प्रशासन के अनुसार यहां मौजूद गणेश प्रतिमा के बारे में पुरातात्विक विशेषज्ञ इसे लगभग 11वीं शताब्दी का मानते हैं, जबकि अन्य सरकारी विवरण इसे 10वीं से 11वीं शताब्दी के बीच नागवंशीय काल से जोड़ते हैं। प्रतिमा की स्थापना किसने और ठीक किस समय की, इसका स्पष्ट ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। यही रहस्य ढोलकल को और आकर्षक बनाता है।
जंगल के बीच पहाड़ी की चोटी पर गणेश का दरबार
ढोलकल गणेश की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां पहुंचने के बाद श्रद्धालुओं को किसी बड़े मंदिर परिसर में नहीं, बल्कि प्रकृति के बीच पहाड़ी की चोटी पर भगवान गणेश के दर्शन होते हैं। चारों ओर घना जंगल, दूर तक दिखाई देती पहाड़ियां और शांत वातावरण इस जगह को बाकी धार्मिक स्थलों से अलग अनुभव देते हैं।
यहां पहुंचने का रास्ता भी यात्रा को खास बना देता है। सड़क से एक निश्चित बिंदु तक पहुंचने के बाद आगे का रास्ता जंगल और पहाड़ी क्षेत्र से होकर ट्रेकिंग का है। दंतेवाड़ा जिला प्रशासन के पर्यटन विवरण में फरसपाल और आसपास के गांवों से होकर ढोलकल भवन तक पहुंचने तथा वहां से प्रशिक्षित स्थानीय गाइड की मदद से पहाड़ी की चोटी तक जाने की जानकारी दी गई है। प्रशासन ने स्थानीय युवाओं को गाइड के रूप में प्रशिक्षित करने की व्यवस्था भी विकसित की है।
यानी ढोलकल की यात्रा केवल दर्शन तक सीमित नहीं है। यह एक ऐसी यात्रा है जिसमें श्रद्धालु और पर्यटक रास्ते भर बस्तर के जंगल और पहाड़ी भू-दृश्य को करीब से महसूस करते हैं।
करीब एक हजार साल पुरानी मानी जाती है प्रतिमा
ढोलकल गणेश की प्रतिमा को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा इसके प्राचीन होने को लेकर होती है। दंतेवाड़ा जिला प्रशासन की वेबसाइट पर इसे 10वीं से 11वीं शताब्दी के बीच का बताया गया है। वहीं जिला प्रशासन के एक अन्य विवरण में पुरातात्विक विशेषज्ञों के हवाले से प्रतिमा को 11वीं शताब्दी का माना गया है। इस आधार पर इसे लगभग एक हजार साल पुरानी ऐतिहासिक धरोहर के रूप में देखा जाता है।
प्रतिमा पत्थर से निर्मित है और इसका स्वरूप भी सामान्य गणेश प्रतिमाओं से अलग दिखाई देता है। चार भुजाओं वाले गणेश के हाथों में अलग-अलग प्रतीक और आयुध दिखाई देते हैं। स्थानीय धार्मिक परंपराओं में प्रतिमा के स्वरूप को भगवान गणेश के एकदंत रूप और परशुराम से जुड़ी कथा के साथ जोड़ा जाता है।
हालांकि प्रतिमा की वास्तविक स्थापना और निर्माण से जुड़ी कई बातें अभी भी शोध का विषय हैं। इसलिए इससे संबंधित ऐतिहासिक दावों और स्थानीय मान्यताओं के बीच अंतर समझना जरूरी है।
परशुराम और गणेश की कथा से जुड़ी है लोकमान्यता
ढोलकल गणेश से जुड़ी सबसे चर्चित कथा भगवान गणेश और परशुराम से संबंधित है। स्थानीय जनश्रुति के अनुसार इसी क्षेत्र में दोनों के बीच युद्ध हुआ था। मान्यता है कि परशुराम के फरसे के प्रहार से भगवान गणेश का एक दांत टूट गया था। इसी कारण गणेश जी को एकदंत कहा गया।
ढोलकल क्षेत्र के आसपास मौजूद फरसपाल गांव के नाम को भी स्थानीय लोग इसी कथा से जोड़ते हैं। उनका मानना है कि परशुराम के फरसे की वजह से इस क्षेत्र का नाम फरसपाल पड़ा। यह धार्मिक लोकविश्वास है और इसका आधार स्थानीय परंपरा एवं पीढ़ियों से चली आ रही कथाएं हैं।
इस तरह ढोलकल केवल एक प्राचीन प्रतिमा का स्थल नहीं है, बल्कि बस्तर की लोकस्मृतियों और धार्मिक परंपराओं का भी हिस्सा है।
2017 में क्षतिग्रस्त हुई थी प्राचीन प्रतिमा
ढोलकल गणेश के इतिहास में वर्ष 2017 की घटना भी बेहद महत्वपूर्ण रही। जनवरी 2017 में पहाड़ी की चोटी से गणेश प्रतिमा गायब मिली थी। बाद में प्रतिमा पहाड़ी के नीचे क्षतिग्रस्त अवस्था में मिली। उस समय पुलिस और प्रशासन ने घटना की जांच की थी और पुलिस अधिकारियों ने संदिग्ध माओवादी भूमिका की आशंका जताई थी, हालांकि घटना के संबंध में अलग-अलग रिपोर्टों में आरोप और जांच की स्थिति को लेकर सावधानी बरती गई थी।
प्रतिमा के क्षतिग्रस्त हिस्सों को प्रशासन और संबंधित विभागों की मदद से एकत्र किया गया और उसे दोबारा उसके मूल स्थान पर स्थापित किया गया। फरवरी 2017 में प्रतिमा की पुनर्स्थापना की खबरें सामने आई थीं। इस घटना के बाद ढोलकल की सुरक्षा और संरक्षण को लेकर भी विशेष ध्यान दिया गया।
आज पहाड़ी की चोटी पर फिर वही प्राचीन गणेश प्रतिमा श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र बनी हुई है।
ढोलकल पहुंचना अपने आप में एक रोमांचक अनुभव
ढोलकल जाने वाले यात्रियों के लिए यह जगह धार्मिक दर्शन के साथ ट्रेकिंग का अनुभव भी देती है। दंतेवाड़ा जिला प्रशासन के अनुसार फरसपाल तक सड़क मार्ग से पहुंचा जा सकता है और वहां से आगे स्थानीय गाइड की सहायता ली जा सकती है। प्रशासन ने ढोलकल क्षेत्र में प्रशिक्षित स्थानीय युवाओं को गाइड के रूप में जोड़ने तथा पर्यटकों के लिए आवश्यक सुविधाएं विकसित करने की दिशा में काम किया है।
दंतेवाड़ा जिला प्रशासन की अलग-अलग वेबसाइट प्रविष्टियों में जिला मुख्यालय से दूरी 13 से 22 किलोमीटर के बीच बताई गई है। यह अंतर संभवतः यात्रा के अलग-अलग मार्ग या पहुंच बिंदुओं से जुड़ा है। इसलिए यात्रा की योजना बनाते समय स्थानीय प्रशासन या स्थानीय गाइड से वर्तमान मार्ग और उपलब्ध सुविधाओं की जानकारी लेना बेहतर रहेगा।
ढोलकल की यात्रा में मौसम का भी विशेष महत्व है। बारिश के दौरान पहाड़ी रास्ते फिसलन भरे हो सकते हैं। इसलिए ट्रेकिंग से पहले स्थानीय परिस्थितियों, मौसम और मार्ग की स्थिति की जानकारी लेना जरूरी है।
धार्मिक आस्था के साथ स्थानीय संस्कृति की झलक
ढोलकल का महत्व सिर्फ भगवान गणेश की प्रतिमा तक सीमित नहीं है। यह क्षेत्र बस्तर की स्थानीय संस्कृति और समुदाय आधारित पर्यटन से भी जुड़ा है। जिला प्रशासन के पर्यटन विवरण में स्थानीय गाइडों और समुदाय आधारित पर्यटन के माध्यम से पर्यटकों को क्षेत्र की प्राकृतिक और सांस्कृतिक विशेषताओं से परिचित कराने की बात कही गई है। स्थानीय भोजन और जनजातीय जीवनशैली को करीब से जानने का अवसर भी यहां मिलने की जानकारी प्रशासनिक वेबसाइट पर दी गई है।
यही वजह है कि ढोलकल की यात्रा एक सामान्य पर्यटन यात्रा से अलग अनुभव देती है। यहां पहुंचने वाला व्यक्ति सिर्फ एक प्राचीन प्रतिमा देखकर वापस नहीं लौटता, बल्कि बस्तर के जंगल, पहाड़, स्थानीय परंपराओं और समुदाय से भी परिचित होता है।
ढोलकल के साथ बारसूर की यात्रा भी बना सकते हैं
दंतेवाड़ा और बस्तर क्षेत्र में धार्मिक और ऐतिहासिक पर्यटन के कई महत्वपूर्ण स्थल हैं। ढोलकल की यात्रा के साथ पर्यटक बारसूर जैसे ऐतिहासिक क्षेत्र को भी अपने यात्रा कार्यक्रम में शामिल कर सकते हैं। इस पूरे क्षेत्र में प्राचीन मंदिर, शिल्पकला, जंगल और पहाड़ी भू-दृश्य एक साथ देखने को मिलते हैं।
दंतेवाड़ा जिला प्रशासन भी जिले को केवल धार्मिक पर्यटन के लिए नहीं, बल्कि प्राकृतिक पर्यटन, ट्रेकिंग और एडवेंचर गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में प्रस्तुत करता है।
बस्तर की पहचान में ढोलकल की अपनी अलग जगह
ढोलकल गणेश की सबसे बड़ी विशेषता शायद यही है कि यहां आस्था और प्रकृति अलग-अलग नहीं दिखाई देतीं। करीब 3000 फीट की ऊंचाई पर जंगलों से घिरी पहाड़ी की चोटी पर विराजमान गणेश प्रतिमा श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक अनुभव देती है, वहीं कठिन ट्रेक और प्राकृतिक दृश्य रोमांच से जोड़ते हैं।
लगभग एक हजार वर्ष पुरानी मानी जाने वाली इस प्रतिमा के निर्माण और स्थापना का इतिहास आज भी कई सवाल अपने भीतर समेटे हुए है। यही रहस्य, स्थानीय लोककथाएं और प्राकृतिक परिवेश ढोलकल को बस्तर के खास पर्यटन स्थलों में शामिल करते हैं।
जो लोग बस्तर को सिर्फ जंगल और आदिवासी संस्कृति के नजरिए से देखते हैं, उनके लिए ढोलकल एक अलग तस्वीर पेश करता है। यहां इतिहास है, लोकविश्वास है, धार्मिक आस्था है, पुरातात्विक महत्व है और प्रकृति के बीच रोमांच से भरी यात्रा भी है। यही कारण है कि दंतेवाड़ा की बैलाडीला पहाड़ियों में स्थित ढोलकल गणेश आज बस्तर की उन पहचान बनती जगहों में शामिल है, जहां पहुंचना जितना चुनौतीपूर्ण है, वहां पहुंचकर मिलने वाला अनुभव उतना ही
