कोरबा के लालपुर और भेजीनारा गांवों के ग्रामीणों ने SECL कोरबा प्रबंधन और TMC प्राइवेट लिमिटेड पर कथित वादाखिलाफी का आरोप लगाते हुए अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया। ग्रामीणों ने रोजगार, मुआवजा, सड़क, पेयजल, भूमि और भू-राजस्व पर्चियों समेत 8 प्रमुख मांगें उठाईं।
कोरबा(वंदे छत्तीसगढ़ मीडिया)
छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में जमीन, रोजगार, मुआवजा और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े लंबे समय से चले आ रहे विवाद ने एक बार फिर आंदोलन का रूप ले लिया है। एसईसीएल कोरबा प्रबंधन और आउटसोर्सिंग कंपनी टीएमसी प्राइवेट लिमिटेड पर कथित वादाखिलाफी तथा ग्रामीणों के अधिकारों की अनदेखी का आरोप लगाते हुए ग्राम लालपुर और भेजीनारा के ग्रामीणों ने विवादित स्थल पर अनिश्चितकालीन धरना शुरू कर दिया है।
भारी बारिश के बावजूद ग्रामीणों का धरना जारी रहा। आंदोलन में बड़ी संख्या में महिला-पुरुषों के साथ स्कूली बच्चों की मौजूदगी भी देखने को मिली। ग्रामीणों का कहना है कि वे लंबे समय से अपनी समस्याओं के समाधान की मांग कर रहे हैं, लेकिन अब तक उन्हें संतोषजनक जवाब नहीं मिला। उनका आरोप है कि पूर्व में हुई 8 सूत्रीय लिखित सहमति को लेकर कंपनी प्रबंधन अब अपने वादे से पीछे हट रहा है।
ग्रामीणों ने साफ कहा है कि जब तक उनकी प्रमुख मांगों पर ठोस कार्रवाई नहीं होती, तब तक अनिश्चितकालीन धरना जारी रहेगा।
8 सूत्रीय लिखित सहमति से पीछे हटने का आरोप
आंदोलन कर रहे ग्रामीणों का मुख्य आरोप है कि एसईसीएल प्रबंधन और संबंधित आउटसोर्सिंग कंपनी के साथ पूर्व में उनकी समस्याओं को लेकर चर्चा हुई थी। इस दौरान कई मुद्दों पर लिखित सहमति बनी थी, लेकिन अब उन सहमतियों को लागू करने की दिशा में अपेक्षित कार्रवाई नहीं हो रही है।
ग्रामीणों का आरोप है कि कंपनी प्रबंधन ने प्रशासन को स्थिति के संबंध में गलत जानकारी दी, जिसके बाद ग्रामीणों को एसडीएम कटघोरा की ओर से नोटिस जारी कराया गया। आंदोलनकारियों का कहना है कि समस्याओं के समाधान के बजाय उन्हें प्रशासनिक कार्रवाई का सामना करना पड़ रहा है।
हालांकि कंपनी प्रबंधन और प्रशासन की ओर से इन आरोपों पर समाचार लिखे जाने तक कोई विस्तृत पक्ष सामने नहीं आया था। ऐसे में ग्रामीणों द्वारा लगाए गए आरोपों और आंदोलन से जुड़े अन्य दावों की स्वतंत्र पुष्टि संबंधित पक्षों के आधिकारिक जवाब के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।
70 प्रतिशत से अधिक आदिवासी आबादी होने का दावा
लालपुर और भेजीनारा के ग्रामीणों के अनुसार, दोनों गांवों में 70 प्रतिशत से अधिक आबादी आदिवासी समुदाय से जुड़ी है। इसी कारण भूमि, रोजगार, दस्तावेज और सामाजिक अधिकारों से जुड़े मुद्दे यहां के लोगों के लिए केवल प्रशासनिक समस्या नहीं, बल्कि उनके भविष्य से जुड़ा सवाल बन गए हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि खनन गतिविधियों और भूमि अधिग्रहण के बाद से प्रभावित परिवारों को कई तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। उनका आरोप है कि जिन परिवारों की जमीन खदान के लिए अधिग्रहित हुई, उन्हें रोजगार और अन्य अधिकारों के संबंध में आज भी स्पष्टता और संतोषजनक समाधान का इंतजार है।
धरना स्थल पर मौजूद ग्रामीणों का कहना है कि उनकी मांगें किसी नई सुविधा की नहीं, बल्कि वर्षों से लंबित उन अधिकारों की हैं, जिनके समाधान का आश्वासन उन्हें पहले दिया गया था।
1987 के भूमि अधिग्रहण का मुद्दा फिर उठा
ग्रामीणों ने वर्ष 1987 में सिंघाली खदान के लिए हुए भूमि अधिग्रहण का मुद्दा भी जोरदार तरीके से उठाया है। उनका आरोप है कि उस समय रोजगार देने के नाम पर किसानों से भू-राजस्व पर्चियां ली गई थीं, लेकिन कई परिवारों को ये पर्चियां आज तक वापस नहीं मिली हैं।
ग्रामीणों के अनुसार, दशकों पुराने इस दस्तावेजी विवाद का असर अब नई पीढ़ी पर भी पड़ रहा है। उनका कहना है कि आवश्यक भू-राजस्व दस्तावेज उपलब्ध नहीं होने के कारण कई बच्चों और युवाओं को जाति प्रमाण पत्र बनवाने में परेशानी हो रही है।
ग्रामीणों का आरोप है कि जाति प्रमाण पत्र सहित जरूरी दस्तावेज समय पर नहीं बनने से विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा में प्रवेश, छात्रवृत्ति और विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ लेने में कठिनाई होती है। इसी मुद्दे को लेकर आंदोलन में स्कूली बच्चों की भागीदारी भी दिखाई दी।
यह पहलू आंदोलन को केवल रोजगार या कंपनी प्रबंधन के विवाद तक सीमित नहीं रखता, बल्कि इसे आने वाली पीढ़ी के शिक्षा और सामाजिक अधिकारों से भी जोड़ता है।
रोजगार और मुआवजे का पूरा विवरण सार्वजनिक करने की मांग
ग्रामीणों की प्रमुख मांगों में खनन और भूमि अधिग्रहण से प्रभावित लोगों को दिए गए रोजगार और मुआवजे का पूरा विवरण सार्वजनिक करना शामिल है। आंदोलनकारियों का कहना है कि प्रभावित परिवारों को यह जानकारी स्पष्ट रूप से मिलनी चाहिए कि किसे रोजगार मिला, किसे मुआवजा दिया गया और किन लोगों के मामले अब भी लंबित हैं।
उनका आरोप है कि स्थानीय विस्थापित और प्रभावित परिवार रोजगार के अवसरों से अपेक्षित रूप से नहीं जुड़ पाए हैं। ग्रामीणों ने मांग की है कि स्थानीय विस्थापितों और प्रभावित परिवारों के लिए वैकल्पिक एवं स्थायी रोजगार की व्यवस्था की जाए।
ग्रामीणों का कहना है कि जमीन जाने के बाद रोजगार केवल आर्थिक मदद का सवाल नहीं होता, बल्कि परिवार की आजीविका और भविष्य की सुरक्षा का भी आधार होता है।
लालपुर-भेजीनारा मुख्य मार्ग बहाल करने की मांग
धरना प्रदर्शन में सड़क और आवागमन का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया है। ग्रामीणों ने लालपुर-भेजीनारा मुख्य मार्ग को बहाल करने की मांग की है।
ग्रामीणों का कहना है कि सड़क केवल गांवों को जोड़ने वाला रास्ता नहीं है, बल्कि स्कूल, अस्पताल, बाजार और अन्य आवश्यक सेवाओं तक पहुंच का माध्यम है। किसी भी मार्ग के प्रभावित होने का सीधा असर बच्चों की पढ़ाई, मरीजों के उपचार और ग्रामीणों के दैनिक जीवन पर पड़ता है।
आंदोलनकारियों ने इस मार्ग को लेकर शीघ्र समाधान की मांग की है और कहा है कि स्थानीय लोगों की आवाजाही के लिए सुरक्षित एवं सुगम रास्ते की व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए।
सार्वजनिक तालाब, पेयजल और निजी भूमि के मुद्दे भी शामिल
ग्रामीणों ने क्षेत्र में एक सार्वजनिक तालाब को कथित रूप से पाटे जाने के मामले की जांच की मांग भी उठाई है। उनका कहना है कि सार्वजनिक उपयोग की संपत्तियों और प्राकृतिक जल स्रोतों को लेकर स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए।
इसके साथ ही दोनों गांवों में स्थायी और पर्याप्त पेयजल व्यवस्था की मांग की गई है। ग्रामीणों के अनुसार, प्रभावित क्षेत्रों में केवल अस्थायी समाधान पर्याप्त नहीं है और लोगों को नियमित रूप से सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
आंदोलन में निजी भूमि पर कथित कब्जे का मुद्दा भी उठाया गया है। ग्रामीणों ने मांग की है कि यदि किसी निजी भूमि पर नियमों के विपरीत कब्जा किया गया है तो उसकी निष्पक्ष जांच कर संबंधित कार्रवाई की जाए।
मुक्तिधाम ध्वस्तीकरण मामले में कार्रवाई की मांग
ग्रामीणों ने मुक्तिधाम से जुड़े कथित ध्वस्तीकरण के मामले में भी कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि मुक्तिधाम जैसे सार्वजनिक और सामाजिक महत्व के स्थल को लेकर ग्रामीणों की भावनाएं जुड़ी होती हैं।
आंदोलनकारियों ने इस मामले की जांच कर जिम्मेदारी तय करने और आवश्यक कार्रवाई करने की मांग प्रशासन से की है।
ग्रामीणों का कहना है कि विकास या औद्योगिक गतिविधियों के दौरान स्थानीय लोगों की धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जरूरतों को भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
कटघोरा विधायक और प्रशासनिक अधिकारियों से मौके पर आने की अपील
धरना दे रहे ग्रामीणों ने कटघोरा विधायक और जिला प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों से मौके पर पहुंचकर वास्तविक स्थिति का निरीक्षण करने की अपील की है। उनका कहना है कि अधिकारी धरना स्थल पर पहुंचकर ग्रामीणों की बात सीधे सुनें और संबंधित कंपनी प्रबंधन के साथ बातचीत कर समाधान का रास्ता निकालें।
ग्रामीणों का मानना है कि वर्षों से लंबित मुद्दों का समाधान केवल पत्राचार या बैठकों से नहीं, बल्कि जमीन पर वास्तविक स्थिति को समझकर किया जा सकता है।
समाचार लिखे जाने तक किसी जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारी के धरना स्थल पर पहुंचने की जानकारी सामने नहीं आई थी। हालांकि आंदोलन की स्थिति और आगे की प्रशासनिक कार्रवाई पर स्थानीय स्तर पर नजर बनी हुई है।
मांगें पूरी होने तक आंदोलन जारी रखने का ऐलान
लालपुर और भेजीनारा के ग्रामीणों ने स्पष्ट कर दिया है कि उनकी मांगों पर ठोस कार्रवाई होने तक आंदोलन समाप्त नहीं किया जाएगा। भारी बारिश के बीच धरना जारी रखना ग्रामीणों के आक्रोश और लंबे समय से लंबित समस्याओं की गंभीरता को भी दर्शाता है।
ग्रामीणों की मांगों में रोजगार और मुआवजे का पूरा विवरण सार्वजनिक करना, लालपुर-भेजीनारा मुख्य मार्ग बहाल करना, सार्वजनिक तालाब से जुड़े मामले की जांच, स्थायी पेयजल व्यवस्था, स्थानीय विस्थापितों को वैकल्पिक रोजगार, निजी भूमि पर कथित कब्जे की जांच, मुक्तिधाम ध्वस्तीकरण मामले में कार्रवाई और वर्ष 1987 से लंबित भू-राजस्व पर्चियां वापस करना शामिल है।
अब इस आंदोलन पर प्रशासन और कंपनी प्रबंधन की अगली प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण होगी। ग्रामीणों की ओर से लगाए गए आरोपों पर एसईसीएल और टीएमसी प्राइवेट लिमिटेड का पक्ष सामने आने के बाद तस्वीर और स्पष्ट हो सकेगी। फिलहाल लालपुर और भेजीनारा के ग्रामीणों का कहना है कि यह लड़ाई केवल आज की समस्याओं की नहीं है, बल्कि जमीन, पहचान, शिक्षा, रोजगार और आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों से जुड़ी हुई है।
ऐसे में सभी पक्षों के बीच संवाद और तथ्यों के आधार पर समाधान की पहल ही इस विवाद को खत्म करने का सबसे प्रभावी रास्ता हो सकती है।
