पद्म विभूषण तीजन बाई के निधन के बाद छत्तीसगढ़ शोक मं डूब गे हे। जानव उनके संघर्ष, पंडवानी के सफर, सम्मान, सामाजिक योगदान अऊ छत्तीसगढ़ी लोककला ला दुनिया तक पहुंचाय के कहानी।
रायपुर (वंदे छत्तीसगढ़ मीडिया)।छत्तीसगढ़ के माटी आज भारी दुख मं डूबे हवय। पंडवानी के अपन अनोखा अंदाज ले दुनिया भर मं छत्तीसगढ़ के पहचान बनाय वाली, पद्म विभूषण सम्मानित लोकगायिका तीजन बाई अब हमर बीच नइ रहिन। उनकर निधन सिरिफ एक कलाकार के बिदाई नइ, बलुक छत्तीसगढ़ के लोकसंस्कृति के एक पूरा युग के अंत आय।
जब तीजन बाई मंच मं दाहिना हाथ मं तानपुरा अऊ बांया हाथ मं टिमकी धरके महाभारत के कथा गाथा सुनावत रहिन, त हजारों लोग मंत्रमुग्ध हो जावत रहिन। उनकर आवाज मं एतीक दम रहिस कि बिना माइक के घंटों तक हजारों लोगन ला बांधे रख सकत रहिन। आज वो आवाज खामोश होगे, फेर उनकर गाए पंडवानी के सुर पीढ़ी दर पीढ़ी गूंजत रहिहीं।
गरीबी ले निकर के दुनिया तक पहुंचिस एक कलाकार
24 अप्रैल 1956 ला दुर्ग जिला के गनियारी गांव मं जनम लेवइया तीजन बाई के बचपन आर्थिक तंगी मं बीतिस। परिवार साधारण रहिस अऊ घर के हालत मजबूत नइ रहिस। फेर बचपन लेच उनकर मन लोककला अऊ महाभारत के कथा मं रम गे रहिस।
सिरिफ 6 बछर के उमर मं वो पंडवानी सुनना शुरू करिन अऊ दस बछर के उमर मं मंच मं पहली बार गाइन। ओ बखत समाज मं महिला मन के पंडवानी गाना स्वीकार नइ करे जावत रहिस। लोग कहत रहिन कि ये पुरुष मन के कला आय। फेर तीजन बाई समाज के विरोध ले डरे नइ। वो अपन कला के भरोसा मं आगू बढ़त रहिन।
13 बछर के उमर मं ‘सीता हरण’ के प्रसंग गाके वो अपन अलग पहचान बना लिहिन। धीरे-धीरे लोगन ला समझ मं आइस कि ये सिरिफ गायन नइ, बल्कि अभिनय, अभिव्यक्ति अऊ लोकसंस्कृति के जीवंत रूप आय।
पंडवानी ला देहिन नई पहचान
पंडवानी छत्तीसगढ़ के सदियों पुरानी लोकगायन परंपरा आय, जिहां महाभारत के कथा ला गायन, अभिनय अऊ संवाद के संग प्रस्तुत करे जाथे। पहले ए कला पुरुष मन तक सीमित रहिस।
तीजन बाई ए परंपरा ला नई दिशा देहिन। वो कथा सुनावत-सुनावत खुदे भीम बन जाथें, द्रौपदी के पीड़ा ला महसूस करवाथें, कृष्ण के शांति संदेश ला आवाज देवाथें। एके मंच मं दर्जनों पात्र के अभिनय करे के उनकर क्षमता लोगन ला हैरान कर देवत रहिस।
उनकर तानपुरा सिरिफ वाद्य नइ रहिस, बल्कि पूरा महाभारत के कहानी के साथी रहिस। मंच मं बिना किसी बड़े संगीत दल के, सिरिफ अपन आवाज अऊ अभिनय के दम मं वो हजारों दर्शक मन के दिल जीत लेवत रहिन।
संघर्ष के बाद मिलिस राष्ट्रीय अऊ अंतरराष्ट्रीय पहचान
तीजन बाई के जीवन आसान नइ रहिस। शादी के बाद घलो गाना बंद करे बर दबाव डारिस। परिवारिक कठिनाई, आर्थिक परेशानी अऊ समाज के विरोध के बावजूद वो अपन कला ला छोड़िन नइ।
1980 के दशक मं दिल्ली मं एक सांस्कृतिक कार्यक्रम मं उनकर प्रस्तुति देखके देशभर के लोगन के ध्यान उनकर ऊपर गीस। ओही समय ले राष्ट्रीय मंच मं पंडवानी के चर्चा बढ़िस अऊ तीजन बाई के पहचान पूरा देश मं बनना शुरू होइस।
बाद मं फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, अमेरिका, मॉरीशस सहित 20 ले जियादा देश मं पंडवानी प्रस्तुत करके वो छत्तीसगढ़ के संस्कृति ला दुनिया भर मं पहुंचाइन। विदेशी दर्शक भले छत्तीसगढ़ी भाषा नइ समझत रहिन, फेर उनकर अभिनय अऊ भाव-भंगिमा सबके दिल जीत लेवत रहिस।
देश के सर्वोच्च सम्मान ले होइस सम्मानित
लोककला मं अतुलनीय योगदान बर भारत सरकार अऊ कई संस्थान मन तीजन बाई ला अनेक प्रतिष्ठित सम्मान देहिन।
- संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1987)
- पद्मश्री (1988)
- पद्मभूषण (2003)
- पद्म विभूषण (2019)
ए सम्मान सिरिफ तीजन बाई बर नइ, बल्कि पूरा छत्तीसगढ़ के लोकसंस्कृति बर गर्व के बात रहिस।
लोककला के संग समाज सेवा मं घलो रहिन आगू
तीजन बाई अपन कला तक सीमित नइ रहिन। वो नई पीढ़ी ला पंडवानी सिखाय बर लगातार काम करिन। सैकड़ों युवा कलाकार मन ला प्रशिक्षण देके वो ए परंपरा ला जीवित रखे के प्रयास करत रहिन।
नक्सल प्रभावित इलाका मं जाके शांति, शिक्षा अऊ सामाजिक जागरूकता के संदेश घलो अपन गीत के माध्यम ले देहिन। कोरोना महामारी के समय घलो जनजागरूकता बर गीत बनाके लोगन ला सावधानी बर प्रेरित करिन।
उनकर मानना रहिस कि पंडवानी सिरिफ रोजगार नइ, बल्कि संस्कृति अऊ समाज सेवा के माध्यम आय।
छत्तीसगढ़ी भाषा के असली पहचान रहिन तीजन बाई
आज जब बहुत कलाकार अपन भाषा बदलके पहचान बनाय के कोशिश करथें, तीजन बाई हमेशा छत्तीसगढ़ी मं गाइन। वो मानत रहिन कि अपन माटी अऊ अपन बोली लेच असली पहचान बनथे।
उनकर हर प्रस्तुति मं छत्तीसगढ़ी के मिठास, लोकजीवन के सरलता अऊ महाभारत के गहराई साफ दिखाई देत रहिस।
अंतिम बखत तक कला ले जुड़े रहिन
पिछला कुछ समय ले तीजन बाई अस्वस्थ चलत रहिन अऊ रायपुर मं इलाज जारी रहिस। आखिरकार आज वो दुनिया ला अलविदा कहि दीन।
उनकर निधन के खबर मिलत ही छत्तीसगढ़ सहित पूरा देश मं शोक के लहर दौड़ गे। कलाकार, साहित्यकार, जनप्रतिनिधि अऊ हजारों प्रशंसक मन सोशल मीडिया के माध्यम ले श्रद्धांजलि अर्पित करत हवंय।
गांव गनियारी मं लोगन के आंखी नम हवंय। हर कोई कहत हवय कि आज छत्तीसगढ़ अपन सबसे अनमोल सांस्कृतिक धरोहर मं ले एक ला खो दिस।
पंडवानी के भविष्य अब नई पीढ़ी के जिम्मेदारी
तीजन बाई के जावत जरूर एक खालीपन बनगे हवय, फेर उनकर तैयार करे शिष्य मन आज घलो पंडवानी के परंपरा ला आगे बढ़ावत हवंय।
जरूरत ए बात के हवय कि सरकार, सांस्कृतिक संस्था अऊ समाज मिलके ए लोककला ला नई पीढ़ी तक पहुंचावंय, ताकि आने वाला समय मं घलो पंडवानी के सुर गूंजत रहय।
छत्तीसगढ़ हमेशा याद रखही अपन तीजन बाई ला
तीजन बाई के जीवन हमन ला सिखाथे कि कठिन परिस्थिति, गरीबी अऊ समाज के विरोध के बावजूद अगर हिम्मत अऊ मेहनत बने रहय, त दुनिया के सबसे बड़े मंच तक पहुंचा जा सकथे।
आज वो भले हमर बीच नइ हवंय, फेर जब-जब पंडवानी के सुर गूंजही, महाभारत के कथा सुनाय जाही अऊ छत्तीसगढ़ी लोककला के बात होही, त तीजन बाई के नाम सबसे पहिली याद करे जाही।
तीजन बाई सिरिफ एक लोकगायिका नइ रहिन, वो छत्तीसगढ़ के संस्कृति, माटी अऊ अस्मिता के जीवंत पहचान रहिन। उनकर सुर, उनकर संघर्ष अऊ उनकर विरासत हमेशा अमर रहिही।
