कोरबा। शहर जब गहरी नींद से जागने की तैयारी कर रहा होता है, उसी समय कुछ लोग अपनी दिनचर्या के सबसे कठिन हिस्से से गुजर रहे होते हैं। ये वे अखबार वितरक हैं, जो हर सुबह साइकिल या बाइक पर सवार होकर खबरों को घर-घर तक पहुंचाते हैं। मजदूर दिवस के मौके पर इन मेहनतकश लोगों की जिंदगी को समझना, उनके संघर्ष को पहचानना और उनके योगदान को सम्मान देना जरूरी हो जाता है।
कोरबा जैसे औद्योगिक शहर में अखबार बांटना केवल एक काम नहीं, बल्कि जोखिम से भरा दायित्व है। सुबह के अंधेरे में जब सडक़ें कोयला ढोने वाले भारी वाहनों से भरी रहती हैं, तब ये वितरक बिना किसी सुरक्षा के अपने रास्ते पर निकल पड़ते हैं। शहर की हवा में घुली राख और धूल उनके लिए रोज की सच्चाई है। कई बार तेज गर्मी, बारिश या सर्दी भी उनके कदम नहीं रोक पाती। इस पेशे से जुड़े एक वरिष्ठ वितरक रामायण सिंह (रामा) उम्र 60 साल बताते हैं कि दशकों से यही दिनचर्या है—सुबह जल्दी उठना, अखबार लेना और तय समय पर हर घर तक पहुंचाना। उनके अनुसार, ‘काम छोटा लग सकता है, लेकिन जिम्मेदारी बड़ी होती है। लोग सुबह की शुरुआत खबरों के साथ करते हैं, और उस भरोसे को निभाना हमारी आदत बन चुका है।’ उम्र बढऩे के बावजूद वे आज भी उसी लगन से काम कर रहे हैं।
दूसरी ओर, नई पीढ़ी के युवा दीपक पात्रे उम्र 21 वर्ष भी इस काम से जुड़े हुए हैं। जो आईटीआई (इलेक्ट्रिकल) में पढ़ाई के साथ यह काम करता है, बताता है कि यह उसके लिए सिर्फ कमाई का जरिया नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का एहसास भी है। ‘सुबह के समय सडक़ पर निकलना आसान नहीं होता, लेकिन यह काम हमें अनुशासन और मेहनत का मूल्य सिखाता है,’ वह कहता है। उसके मुताबिक, समाज को इस काम को केवल एक साधारण सेवा के रूप में नहीं, बल्कि महत्वपूर्ण जिम्मेदारी के रूप में देखना चाहिए। हालांकि, इन वितरकों की समस्याएं लंबे समय से अनदेखी रही हैं। स्वास्थ्य के लिहाज से वे लगातार प्रदूषण के संपर्क में रहते हैं, जिससे सांस और अन्य बीमारियों का खतरा बना रहता है। सुरक्षा के लिए उनके पास पर्याप्त साधन नहीं होते और किसी दुर्घटना की स्थिति में आर्थिक सुरक्षा भी लगभग न के बराबर होती है। इसके बावजूद वे हर दिन अपनी जिम्मेदारी निभाने में पीछे नहीं हटते। मजदूर दिवस के इस अवसर पर जरूरत है कि इन अखबार वितरकों के लिए कल्याण बोर्ड का गठन करना चाहिए शासन को जिससे असंगठित श्रमिकों के रूप में पहचान मिले, ताकि वे सरकारी योजनाओं और सामाजिक सुरक्षा का लाभ उठा सकें। साथ ही, समाज को भी उनके प्रति सम्मानजनक व्यवहार अपनाना चाहिए। क्योंकि सच यही है कि जब तक ये मेहनती लोग हर सुबह सडक़ों पर निकलकर खबरों को घर-घर पहुंचाते रहेंगे, तब तक शहर की सुबह सच में पूरी नहीं होगी। उनका श्रम ही उस अनदेखी कड़ी की तरह है, जो हर नागरिक को दुनिया से जोड़े रखता है।
साइकिल पर सवार खबरें: कोरबा की सुबह को जगाते मेहनतकश हाथ
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