बलरामपुर के कुसमी विकासखंड में सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी एक बार फिर उजागर हुई। अमरपुर पंचायत के भैसापाठ-घुइझरिया बस्ती में बीमार बुजुर्ग महिला को ग्रामीणों ने झेलगी में टांगकर 2 किलोमीटर पैदल मुख्य सड़क तक पहुंचाया। पढ़ें पूरी रिपोर्ट।
बलरामपुर (वंदे छत्तीसगढ़ मीडिया)। छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने विकास, सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं के सरकारी दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिले के कुसमी विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत अमरपुर की भैसापाठ-घुइझरिया बस्ती में सोमवार सुबह एक बुजुर्ग महिला की तबीयत अचानक बिगड़ गई। परिवार और ग्रामीणों ने तत्काल एंबुलेंस सेवा से संपर्क करने का प्रयास किया, लेकिन बस्ती तक पहुंचने के लिए पक्की और सुगम सड़क नहीं होने के कारण कोई भी वाहन वहां नहीं पहुंच सका।
आखिरकार ग्रामीणों के सामने एक ही विकल्प बचा—अपने पारंपरिक संसाधनों का सहारा लेना। उन्होंने लकड़ी और कपड़े से बनी झेलगी तैयार की और करीब 50 वर्षीय महिला रदनी को उसमें बैठाकर कंधों पर उठाते हुए लगभग दो किलोमीटर तक पैदल मुख्य सड़क तक पहुंचाया। इसके बाद किसी तरह वाहन की व्यवस्था कर उन्हें अस्पताल भेजा गया।
यह घटना केवल एक महिला के अस्पताल पहुंचने की कहानी नहीं है, बल्कि उन सैकड़ों दूरस्थ गांवों की वास्तविकता भी बयां करती है जहां आज भी सड़क, स्वास्थ्य और आपातकालीन सेवाएं लोगों के लिए सपना बनी हुई हैं।
सुबह बिगड़ी तबीयत, लेकिन गांव तक नहीं पहुंच सकी एंबुलेंस
जानकारी के अनुसार ग्राम पंचायत अमरपुर की भैसापाठ-घुइझरिया बस्ती निवासी रदनी की सोमवार सुबह अचानक तबीयत खराब हो गई। परिजनों ने बिना देर किए स्वास्थ्य विभाग की एंबुलेंस सेवा से संपर्क किया ताकि उन्हें जल्द अस्पताल पहुंचाया जा सके।
लेकिन जब एंबुलेंस कर्मियों को गांव का रास्ता बताया गया तो पता चला कि बस्ती तक वाहन पहुंचाने लायक सड़क ही मौजूद नहीं है। कच्चा और दुर्गम रास्ता होने के कारण एंबुलेंस बीच रास्ते से आगे नहीं जा सकी। ऐसे में मरीज तक पहुंचने का पूरा जिम्मा ग्रामीणों पर आ गया।
झेलगी बनी जीवन बचाने का सहारा
ग्रामीणों ने समय गंवाने के बजाय तुरंत झेलगी तैयार की। यह ग्रामीण इलाकों में पारंपरिक रूप से इस्तेमाल होने वाला साधन है, जिसमें बीमार या घायल व्यक्ति को बैठाकर कंधों पर उठाया जाता है।
चार-पांच ग्रामीणों ने बारी-बारी से झेलगी को अपने कंधों पर उठाया और ऊबड़-खाबड़ रास्तों, पगडंडियों और कीचड़ से गुजरते हुए करीब दो किलोमीटर पैदल चलकर महिला को मुख्य सड़क तक पहुंचाया।
मुख्य सड़क पर पहुंचने के बाद वाहन की व्यवस्था की गई, जिसके जरिए महिला को अस्पताल ले जाया गया, जहां उनका उपचार शुरू किया गया।
आज भी विकास से कोसों दूर हैं कई बस्तियां

यह घटना एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर करती है कि आजादी के दशकों बाद भी प्रदेश के कई आदिवासी और वनांचल क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाएं पूरी तरह नहीं पहुंच सकी हैं।
सरकारें लगातार सड़क, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास की योजनाओं का दावा करती रही हैं, लेकिन जमीनी हकीकत अक्सर इन दावों से अलग दिखाई देती है। कई गांवों में आज भी बरसात के मौसम में सड़कें कीचड़ में तब्दील हो जाती हैं और वाहन पहुंचना लगभग असंभव हो जाता है।
ऐसे हालात में यदि किसी मरीज की हालत गंभीर हो जाए तो अस्पताल तक पहुंचने में होने वाली देरी उसकी जान के लिए खतरा बन सकती है।
स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच पर उठे सवाल
विशेषज्ञों का मानना है कि आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था तभी प्रभावी मानी जाएगी, जब मरीज तक समय पर एंबुलेंस पहुंच सके। यदि सड़क ही नहीं होगी तो आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना मुश्किल हो जाएगा।
ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने कई बार सड़क निर्माण की मांग संबंधित अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के सामने रखी है, लेकिन अब तक कोई स्थायी समाधान नहीं निकला।
बरसात के दिनों में हालात और अधिक खराब हो जाते हैं। गांव तक पहुंचने वाले रास्ते दलदल में बदल जाते हैं, जिससे मरीजों, गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों को सबसे अधिक परेशानी उठानी पड़ती है।
ग्रामीणों ने दिखाई मानवता और एकजुटता
जहां एक ओर सरकारी व्यवस्था सवालों के घेरे में नजर आई, वहीं दूसरी ओर ग्रामीणों ने मानवीय संवेदनाओं की मिसाल पेश की।
किसी ने झेलगी तैयार की, किसी ने कंधा दिया और किसी ने रास्ते भर सहारा बनकर बीमार महिला को सुरक्षित मुख्य सड़क तक पहुंचाया। यह सामूहिक प्रयास बताता है कि कठिन परिस्थितियों में गांव के लोग आज भी एक-दूसरे के लिए सबसे बड़ा सहारा बनते हैं।
हालांकि ग्रामीणों का कहना है कि ऐसी स्थिति बार-बार पैदा होना किसी भी विकसित समाज के लिए चिंता का विषय है। उनका कहना है कि यदि सड़क और स्वास्थ्य सुविधाएं समय पर उपलब्ध होतीं तो मरीज को इस तरह कंधों पर ढोने की नौबत नहीं आती।
ग्रामीणों की प्रमुख मांगें
घटना के बाद क्षेत्र के लोगों ने प्रशासन से कई मांगें रखी हैं, जिनमें प्रमुख रूप से—
- भैसापाठ-घुइझरिया बस्ती तक सर्व मौसम (ऑल वेदर) सड़क का निर्माण।
- आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं की बेहतर उपलब्धता।
- दुर्गम क्षेत्रों के लिए विशेष चिकित्सा परिवहन व्यवस्था।
- बरसात के मौसम में वैकल्पिक पहुंच मार्ग विकसित करना।
- ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की नियमित निगरानी।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते इन समस्याओं का समाधान नहीं किया गया तो भविष्य में किसी गंभीर मरीज की जान भी जा सकती है।
विकास के दावों के बीच जमीनी हकीकत
बलरामपुर जिले की यह घटना केवल एक स्थानीय समाचार नहीं है, बल्कि यह उस चुनौती की ओर संकेत करती है जिसका सामना आज भी दूरस्थ ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों के हजारों परिवार कर रहे हैं।
एक ओर डिजिटल इंडिया, आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं और ग्रामीण विकास की योजनाओं की बात होती है, वहीं दूसरी ओर ऐसी तस्वीरें यह याद दिलाती हैं कि विकास तभी सार्थक होगा, जब उसकी पहुंच अंतिम छोर पर बसे व्यक्ति तक भी समान रूप से हो।
बीमार महिला को झेलगी में बैठाकर कंधों पर अस्पताल तक पहुंचाने की यह घटना प्रशासन और नीति-निर्माताओं के लिए एक गंभीर संदेश है कि केवल योजनाओं की घोषणा पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनका प्रभावी क्रियान्वयन भी उतना ही आवश्यक है।
