रायगढ़। हमर पुरखा मन के धर्मग्रंथ मं ऋषि-मुनि मन के जंगल, पहाड़ अऊ कंदरा मं बरसों तक कठोर तपस्या करे के वर्णन मिलथे। आज के आधुनिक जमाना मं बहुतेक लोग एला कथा-कहानी या कल्पना समझथें, फेर छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिला मं एक अइसने तपस्वी हें, जेन ह मानव समाज ला अपन आंखी ले देखे बर मौका देथें कि तपस्या आज घलो जिंदा हवय।
रायगढ़ जिला मुख्यालय ले लगे ग्राम कोसमनारा मं बाबा सत्यनारायण पिछले 28 बरस ले हठयोग अऊ तपस्या मं लीन हें। 16 फरवरी 1998 ले शुरू होय ये तपस्या आज लाखों श्रद्धालु मन बर आस्था के प्रतीक बन गे हवय। भीषण गर्मी, कड़कड़ाती ठंड अऊ मुसलाधार बरसात के बीच बिना छत अऊ बिना किसी आधुनिक सुविधा के बाबाजी के तपस्या आज घलो अविरत जारी हवय।
रायगढ़ इलाका मं गर्मी के दिन मं तापमान 47 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाथे। अइसने कठिन मौसम मं घलो बाबा सत्यनारायण बिना किसी छांव के ध्यान अऊ हठयोग मं बैठे रहिथें। ए दृश्य श्रद्धालु मन बर किसी चमत्कार ले कम नइ माने जावत। दूर-दूर ले लोग मन कोसमनारा पहुंचके बाबाजी के दर्शन करथें अऊ अपन जीवन ला धन्य मानथें।
बाबाजी के दिनचर्या घलो रहस्य ले भरपूर हवय। आम जनता ला नइ पता कि वो कब खाथें या कब ध्यान ले बाहर आवथें। उनकर नजदीकी भक्त मन के मुताबिक बाबाजी चौबीस घंटा मं सिरिफ एकेच बेर अर्द्धरात्रि के समय लगभग आधा घंटा बर समाधि ले उठथें। ए दौरान नित्यकर्म पूरा करके थोड़ा दूध अऊ फल ग्रहण करथें अऊ फेर तपस्या मं लीन हो जाथें।
बाबा सत्यनारायण के जन्म रायगढ़ जिला के देवरी-डूमरपाली गांव मं एक साधारण किसान परिवार मं होय रहिस। उनकर जनम 12 जुलाई 1984 के दयानिधि साहू अऊ हँसमती साहू के घर मं होय रहिस। बचपन लेच उनकर झुकाव आध्यात्मिकता अऊ भगवान शिव के भक्ति के ओर रहिस।
गांव वाले बताथें कि बचपन मं एक बेर वो गांव के शिव मंदिर मं लगातार सात दिन तक ध्यान अऊ तपस्या मं बैठे रहिन। परिवार अऊ गांव के लोगन मन के समझाइस के बाद वो घर त लौट आइन, फेर भगवान शिव के प्रति उनकर भक्ति दिन-ब-दिन अउ बढ़त गीस।
जब वो सिरिफ 14 बरस के रहिन, तब एक दिन स्कूल जाए बर बस्ता उठाइन, फेर स्कूल नइ गइन। सफेद कमीज अऊ खाकी हाफ पैंट वाले स्कूल ड्रेस मं घर ले निकलके वो पैदल-पैदल रायगढ़ के ओर चल परिन। अपन गांव ले करीब 19 किलोमीटर दूर कोसमनारा पहुंचके एक बंजर जमीन मं कुछ पत्थर जोड़के शिवलिंग के रूप बनाइन।
कहिथें कि शिवभक्ति के चरम समर्पण मं बाबाजी अपन जीभ काटके शिवलिंग ला अर्पित कर दीन। कुछ दिन तक ए बात के जानकारी किसी ला नइ होइस, फेर धीरे-धीरे ये खबर आसपास के इलाका मं फैल गे। लोगन मन के भीड़ उमड़ना शुरू होगे अऊ सब्बो के मन मं एकेच सवाल रहिस – आखिर ए बालक मं अइसन तपस्या करे के शक्ति कहां ले आइस?
जेन जगह मं बाबाजी तपस्या शुरू करिन, ओही जगह आज हजारों श्रद्धालु मन बर आस्था के केंद्र बन चुके हवय। समय के संग-संग कोसमनारा मं श्रद्धालु मन बर जरूरी सुविधा मन के व्यवस्था होगे हवय, फेर बाबाजी आज घलो अपन ऊपर छत बनवाय के अनुमति नइ देय हें। उनकर कहना हवय कि तपस्या प्रकृति के साक्षी मं होय बर चाही।
बाबाजी के असली नाव हलधर रहिस। परिवार वाले प्रेम ले ओला सत्यम कहिके बुलावत रहिन। फेर जब लोगन मन उनकर अद्भुत तपस्या अऊ भगवान नारायण के प्रति श्रद्धा ला देखिन, तब ओमन ओला “बाबा सत्यनारायण” कहिके पुकारना शुरू कर दीन। आज पूरा छत्तीसगढ़ अऊ आसपास के राज्य मं वो एही नाव ले प्रसिद्ध हें।
विशेष बात ये हवय कि बाबाजी आमतौर मं बातचीत नइ करंय। जब कभू-कभार ध्यान ले बाहर आवथें, तब भक्त मन संग इशारा के माध्यम ले संवाद करथें। फेर उनकर मौन अऊ तपस्या ही हजारों लोगन बर प्रेरणा के स्रोत बने हवय।
आज कोसमनारा सिरिफ एक गांव नइ, बल्कि श्रद्धा, भक्ति अऊ तपस्या के प्रतीक बन चुके हवय। जिहां हर दिन सैकड़ों श्रद्धालु मन दर्शन बर पहुंचथें अऊ आध्यात्मिक शांति के अनुभव करथें। आधुनिकता अऊ भौतिकता के दौर मं बाबा सत्यनारायण के 28 बरस के तपस्या ए बात के प्रमाण हवय कि आस्था, संयम अऊ आत्मसाधना के शक्ति आज घलो जीवित हवय।
कोसमनारा के धरती मं विराजमान बाबा सत्यनारायण के कठोर तपस्या आने वाली पीढ़ी मन बर घलो प्रेरणा के स्रोत बने रहिही। श्रद्धालु मन के मानना हवय कि बाबाजी के दर्शन मात्र ले मन ला शांति मिलथे अऊ जीवन मं सकारात्मक ऊर्जा के संचार होथे।
