बिलासपुर, 21 जून छत्तीसगढ़ के मेडिकल ग्रेजुएट छात्रों के लिए एक महत्वपूर्ण और राहत भरी खबर सामने आई है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि राज्य सरकार “छत्तीसगढ़ मेडिकल, डेंटल एवं फिजियोथैरेपी अंडर ग्रेजुएट प्रवेश नियम 2025” के तहत निर्धारित समय सीमा के भीतर नियुक्ति आदेश जारी नहीं करती है, तो एमबीबीएस छात्रों द्वारा निष्पादित अनिवार्य सेवा बांड स्वतः समाप्त माना जाएगा। यह फैसला न केवल याचिकाकर्ता छात्रों के लिए बल्कि भविष्य में ऐसे सभी मेडिकल छात्रों के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
यह मामला उन मेडिकल छात्रों से जुड़ा है जिन्होंने अपनी एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी करने के बाद अनिवार्य सेवा बांड के तहत सरकारी नियुक्ति की प्रतीक्षा की, लेकिन निर्धारित अवधि के भीतर उन्हें नियुक्ति नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने न्यायालय की शरण ली।
दरअसल, वर्ष 2025 में सिम्स बिलासपुर से एमबीबीएस की पढ़ाई और अनिवार्य रोटेटिंग इंटर्नशिप पूरी करने वाले छात्र नितीन कुमार सिंह, साहिल करी, चंद्र प्रकाश रवि एवं साक्षी कंवर ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की थी। याचिका में उन्होंने राज्य सरकार द्वारा समय सीमा के भीतर नियुक्ति आदेश जारी नहीं करने के बावजूद उन्हें अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) देने से इनकार किए जाने को चुनौती दी थी।
इस मामले की सुनवाई हाईकोर्ट के जस्टिस ए.के. प्रसाद की एकलपीठ में हुई। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से यह तर्क रखा गया कि “छत्तीसगढ़ मेडिकल, डेंटल एवं फिजियोथैरेपी अंडर ग्रेजुएट प्रवेश नियम 2025” के नियम 10(6) में स्पष्ट प्रावधान है कि यदि सरकार निर्धारित समय सीमा के भीतर नियुक्ति आदेश जारी नहीं करती है, तो संबंधित छात्र का सेवा बांड स्वतः समाप्त हो जाता है। ऐसी स्थिति में छात्रों को एनओसी जारी की जानी चाहिए ताकि वे अपने करियर के अन्य विकल्पों को आगे बढ़ा सकें।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद सरकार की ओर से नियुक्ति का इंतजार किया, लेकिन छह माह की वैधानिक अवधि बीत जाने के बाद भी उन्हें नियुक्ति नहीं मिली। इसके बावजूद उन्हें सेवा बांड से मुक्त नहीं किया गया और एनओसी जारी करने से भी मना कर दिया गया, जिससे उनके उच्च शिक्षा और रोजगार के अवसर प्रभावित हो रहे थे।
वहीं, राज्य सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए अदालत में अपना पक्ष रखा। सरकार की ओर से कहा गया कि याचिकाकर्ता छात्रों ने प्रवेश के समय अनिवार्य सेवा बांड निष्पादित किया था, जिसके तहत उन्हें सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में सेवा देना अनिवार्य है। राज्य सरकार ने यह भी तर्क दिया कि छात्रों ने काउंसलिंग प्रक्रिया में भाग लिया था और बाद में नियुक्ति आदेश भी जारी किए गए थे। इसलिए वे सेवा बांड की शर्तों से मुक्त नहीं हो सकते।
हालांकि, हाईकोर्ट ने नियमों की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया कि यदि निर्धारित समय सीमा के भीतर नियुक्ति आदेश जारी नहीं किया जाता है, तो सेवा बांड को अनिश्चितकाल तक प्रभावी नहीं रखा जा सकता। न्यायालय ने कहा कि नियम 10(6) का उद्देश्य छात्रों को अनिश्चित प्रतीक्षा की स्थिति में रखना नहीं है, बल्कि एक निश्चित समय सीमा के भीतर सरकार द्वारा निर्णय लिया जाना आवश्यक है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि हाईकोर्ट का यह फैसला मेडिकल शिक्षा और सेवा बांड व्यवस्था के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे उन छात्रों को राहत मिलेगी जो पढ़ाई पूरी करने के बाद लंबे समय तक नियुक्ति की प्रतीक्षा करते रहते हैं और उनके करियर की प्रगति प्रभावित होती है।
यह निर्णय भविष्य में राज्य की स्वास्थ्य सेवा नीतियों और मेडिकल छात्रों से संबंधित सेवा बांड व्यवस्था पर भी प्रभाव डाल सकता है। साथ ही, सरकार के लिए यह संदेश भी है कि वह निर्धारित समय सीमा के भीतर नियुक्ति प्रक्रिया को पूरा करे, ताकि छात्रों के अधिकारों और उनके भविष्य के साथ कोई अनिश्चितता न बनी रहे।
फिलहाल हाईकोर्ट के इस फैसले को मेडिकल छात्रों के हित में एक बड़ी राहत के रूप में देखा जा रहा है। इससे हजारों मेडिकल ग्रेजुएट छात्रों को अपने करियर को लेकर नई उम्मीद और स्पष्टता मिलने की संभावना है।
