रायपुर ,ग्रामीण क्षेत्रों को स्वच्छ और सस्ती ऊर्जा उपलब्ध कराने की दिशा में छत्तीसगढ़ सरकार ने एक महत्वपूर्ण पहल की है। रायगढ़ जिले के जनपद पंचायत खरसिया अंतर्गत ग्राम बड़े देवगांव में वर्षों से बंद पड़ा गोबर गैस (बायोगैस) संयंत्र अब एक बार फिर से क्रियाशील हो गया है। इस पहल को न केवल स्वच्छ ऊर्जा के विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, बल्कि यह ग्रामीण आत्मनिर्भरता, पर्यावरण संरक्षण और जैविक खेती को बढ़ावा देने वाला एक प्रभावी कदम भी साबित होगा।
ग्रामीण भारत में ऊर्जा आत्मनिर्भरता की अवधारणा को साकार करने में बायोगैस संयंत्रों की भूमिका लंबे समय से महत्वपूर्ण रही है। ऐसे संयंत्र जहां एक ओर घरेलू उपयोग के लिए स्वच्छ ईंधन उपलब्ध कराते हैं, वहीं दूसरी ओर गोबर और जैविक अपशिष्टों के वैज्ञानिक प्रबंधन के जरिए पर्यावरण संरक्षण में भी अहम योगदान देते हैं।
बड़े देवगांव का बायोगैस संयंत्र फिर बना ग्रामीणों की उम्मीद
रायगढ़ जिले के बड़े देवगांव स्थित इस बायोगैस संयंत्र को दोबारा शुरू करने के लिए व्यापक तकनीकी निरीक्षण और मरम्मत कार्य किए गए। जिला पंचायत रायगढ़ के मुख्य कार्यपालन अधिकारी के मार्गदर्शन में क्रेडा (CREDA) की तकनीकी टीम, जिला पंचायत के अधिकारियों और ग्राम पंचायत प्रतिनिधियों ने संयुक्त रूप से संयंत्र का परीक्षण किया।
निरीक्षण के दौरान संयंत्र में आवश्यक तकनीकी सुधार और मरम्मत कार्य पूरे किए गए। इसके बाद बायोगैस उत्पादन की प्रक्रिया को पुनः शुरू कर गैस से चूल्हा जलाकर उसका परीक्षण किया गया। परीक्षण पूरी तरह सफल रहा और यह सुनिश्चित किया गया कि संयंत्र अब नियमित रूप से ग्रामीणों को गैस उपलब्ध करा सकेगा।
एलपीजी पर निर्भरता होगी कम, घरेलू खर्च में मिलेगी राहत
बायोगैस संयंत्र के दोबारा शुरू होने से गांव के परिवारों को अब खाना पकाने के लिए स्वच्छ और सस्ता ईंधन उपलब्ध होगा। इससे एलपीजी सिलेंडर पर निर्भरता कम होगी और घरेलू खर्च में भी उल्लेखनीय बचत होगी।
ग्रामीण क्षेत्रों में जहां कई बार एलपीजी सिलेंडर की उपलब्धता और कीमत दोनों चिंता का विषय बन जाती हैं, वहां बायोगैस एक स्थायी और सुलभ विकल्प के रूप में सामने आ रही है। गोबर और अन्य जैविक अपशिष्टों से बनने वाली यह गैस न केवल पर्यावरण के अनुकूल है, बल्कि इससे घरों में धुएं की समस्या भी कम होती है, जिससे महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
गोबर और जैविक कचरे से बनेगी ऊर्जा, खेतों को मिलेगी जैविक खाद
विशेषज्ञों का मानना है कि बायोगैस संयंत्र ऊर्जा उत्पादन के साथ-साथ जैविक खेती को भी बढ़ावा देते हैं। संयंत्र में गोबर और अन्य जैविक अपशिष्टों के प्रसंस्करण के बाद जो अवशेष बचता है, वह उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद के रूप में उपयोग किया जाता है।
यह खाद मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के साथ-साथ रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने में भी सहायक होती है। इससे किसानों की लागत घटती है और पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिलता है।
ग्रामीणों में खुशी, बोले- अब मिलेगी स्वच्छ ऊर्जा की सुविधा
बायोगैस संयंत्र के पुनः शुरू होने से बड़े देवगांव के ग्रामीणों में उत्साह का माहौल है। ग्रामीणों ने कहा कि अब उन्हें स्वच्छ ईंधन की सुविधा गांव में ही उपलब्ध होगी, जिससे पारंपरिक ईंधनों पर उनकी निर्भरता कम होगी और समय के साथ घरेलू खर्च में भी कमी आएगी।
इस अवसर पर ग्रामीणों और हितग्राहियों को संयंत्र के नियमित संचालन से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी भी दी गई। उन्हें बताया गया कि संयंत्र को सुचारु रूप से चलाने के लिए गोबर की निर्धारित मात्रा में आपूर्ति, पाइपलाइन की नियमित जांच तथा किसी भी तकनीकी समस्या की तत्काल सूचना देना आवश्यक है।
स्वच्छ ऊर्जा और आत्मनिर्भर गांव की दिशा में मजबूत पहल
राज्य सरकार ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छ ऊर्जा के प्रसार और नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। बायोगैस संयंत्रों के पुनर्जीवन और उनके नियमित संचालन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है ताकि ग्रामीण परिवारों को सस्ती और टिकाऊ ऊर्जा उपलब्ध हो सके।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इस तरह के बायोगैस संयंत्रों का विस्तार अन्य गांवों में भी किया जाता है, तो इससे न केवल ऊर्जा संकट का समाधान होगा, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छता, जैविक खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई मजबूती मिलेगी।
बड़े देवगांव में बंद पड़े बायोगैस संयंत्र का पुनः शुरू होना इस बात का उदाहरण है कि सही योजना और सामूहिक प्रयासों के जरिए गांवों को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है। यह पहल आने वाले समय में अन्य ग्रामीण क्षेत्रों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन सकती है।
