रायपुर।(वंदे छत्तीसगढ़ मीडिया) छत्तीसगढ़ के खान-पान मं जइसे बोरे-बासी, चीला अऊ फरा के अपन अलग पहचान हवय, ओहीच तरे मीठा पकवान मन मं अरसा रोटी के खास जगह हवय। चांउर अऊ गुड़ ले बने ये पारंपरिक मिठाई सिरिफ स्वाद भर नई, बल्कि छत्तीसगढ़ के संस्कृति, आस्था, परिवार अऊ तिहार मन के गहिरा जुड़ाव के चिन्ह आय। गांव होय या शहर, तीजा, पोरा, हरेली, दीवारी, नवाखाई या बिहाव-बियाह जइसने शुभ अवसर मन मं अरसा रोटी के बनना शुभ मानाय जाथे।
बुजुर्ग मन कहिथें कि “जेन घर मं अरसा बने, ओ घर मं सुख-समृद्धि अऊ लक्ष्मी के वास रहिथे।” एखर सेती आज घलो अरसा सिरिफ एक मिठाई नई, बल्कि परंपरा अऊ अपन संस्कृति के जीवंत पहचान बनके बांचे हवय।
का आय अरसा रोटी?
अरसा रोटी चांउर के बारीक आटा अऊ गुड़ के एक तार चासनी ले बनाय जाथे। छत्तीसगढ़ के अलग-अलग इलाका मं एकर नाव अरसा, अइरसा अऊ कई जगा अनरसा घलो कहे जाथे।
देखे मं ये हल्का भूरा रंग के गोल आकार के होथे। एकर किनारा जालीदार होथे अऊ ऊपर सफेद तिल चिपकाय जाथे, जऊन एकर सुंदरता अऊ स्वाद दूनों ला बढ़ा देथे। बाहर ले हल्का कुरकुरा अऊ भीतर ले नरम होय के कारण ये हर उमर के लोगन ला पसंद आथे।
अरसा बनाय के पारंपरिक तरीका – धीरज अऊ अनुभव के काम
अरसा रोटी बनाना आसान नई होवय। एकर स्वाद अऊ गुणवत्ता बर लगभग तीन दिन के तैयारी करे जाथे।
सबले पहिली मोटा किसिम के चांउर, जइसने सरना या एचएमटी, ला तीन दिन तक पानी मं भिजोय जाथे। रोज पानी बदलाय जाथे ताकि खमीर नई उठय। चौथा दिन चांउर ला छांव मं सुखाके बारीक पीस ले जाथे। आटा एकदम सूखा अऊ भुरभुरा होना चाही।
ओकर बाद गुड़ ला पानी मं गलाके एक तार के चासनी बनाय जाथे। चासनी के सही गाढ़ापन अरसा के स्वाद के सबसे बड़े राज आय। चासनी पतला होही त अरसा फूट जाही अऊ जादा गाढ़ा होही त कठोर बन जाही।
गरम चासनी मं धीरे-धीरे चांउर के आटा मिलाके सख्त आटा गूंथे जाथे। एमा सौंफ अऊ इलायची पाउडर मिलाय जाथे, जऊन एकर खुशबू ला अउ बढ़ा देथे। गूंथे आटा ला करीब चार-पांच घंटा ढंक के रखे जाथे।
आटा तैयार होय के बाद छोटे-छोटे लोई बनाके हथेली ले गोल आकार देय जाथे। ऊपर सफेद तिल चिपकाके मध्यम आंच मं देसी घी या रिफाइंड तेल मं धीरे-धीरे तले जाथे। सुनहरा भूरा रंग आ जाथे त अरसा तैयार हो जाथे।
तिहार अऊ शुभ अवसर मन के सबसे खास मिठाई
छत्तीसगढ़ मं अरसा रोटी के महत्व सिरिफ स्वाद तक सीमित नई हवय।
तीजा अऊ पोरा
भादो महीना मं मनाय जइय्या तीजा तिहार मं मायके आय बेटी मन अपन महतारी के हाथ के बने अरसा खाके व्रत खोलथें। पोरा तिहार मं किसान मन अपन बैल मन ला घलो अरसा खिलाथें, जऊन मेहनत अऊ समृद्धि के प्रतीक माने जाथे।
हरेली अऊ दीवारी
हरेली मं खेती-किसानी के समृद्धि बर पूजा-पाठ मं अरसा चढ़ाय जाथे। दीवारी मं लक्ष्मी पूजा के समय बताशा, खुरमी अऊ दूसर मिठाई संग अरसा के भोग लगाय जाथे। मान्यता हवय कि अरसा चढ़ाय ले घर मं बरकत बने रहिथे।
बिहाव-बियाह
छत्तीसगढ़ के बिहाव परंपरा मं अरसा के विशेष महत्व हवय। भांवर के बाद दुल्हन ला दही अऊ अरसा खवाय जाथे, जऊन ला “मीठी विदाई” कहे जाथे। कई इलाका मं बिहाव के नेवता संग अरसा भेजे के परंपरा आज घलो जीवित हवय।
धार्मिक अऊ सामाजिक महत्व
छत्तीसगढ़ के कई प्रसिद्ध देवी मंदिर मन मं अरसा के भोग चढ़ाय जाथे। ग्रामीण इलाका मं देवी-देवता मन ला सबसे पहिली अरसा अर्पित करे के परंपरा हवय।
गांव मन मं प्रसव के बाद महिला मन ला गुड़, अजवाइन अऊ अरसा खिलाय जाथे। बुजुर्ग मन के मानना हवय कि एले शरीर ला ताकत मिलथे अऊ स्वास्थ्य सुधरथे।
अब बाजार मं घलो बढ़त हवय अरसा के मांग
समय के संग अरसा रोटी घलो आधुनिक रूप धरत हवय। महिला स्व-सहायता समूह मन अरसा ला बेहतर पैकेजिंग मं तैयार करत हवंय। वैक्यूम पैकिंग के कारण अब अरसा के शेल्फ लाइफ कई महीना तक हो जाथे, जऊन ले देश के अलग-अलग हिस्सा मं रहय्या छत्तीसगढ़िया मन घलो अपन पसंदीदा मिठाई के स्वाद ले सकत हवंय।
राज्य मं महिला समूह मन ला प्रशिक्षण अऊ पैकेजिंग के सुविधा देके अरसा उत्पादन ला बढ़ावा देय जात हवय। अब मिलेट अरसा घलो बाजार मं आइस, जेमां चांउर संग रागी अऊ कोदो के उपयोग करे जात हवय। ये स्वास्थ्य के नजरिया ले घलो बेहतर विकल्प माने जात हवय।
इतकेच नई, अब कुछ कैफे मन मं “अरसा विद वनीला” के नाम ले आइसक्रीम संग परोसे जावत हवय, जऊन नई पीढ़ी मं घलो तेजी ले लोकप्रिय होवत हवय।
असली अरसा के पहचान कइसे करबो?
अगर आप असली पारंपरिक अरसा खरीदे चाहत हव, त ए बात मन के ध्यान रखव—
- रंग हल्का सुनहरा भूरा होना चाही।
- किनारा जालीदार अऊ बीच हल्का फूला होना चाही।
- तिल ऊपर चिपका होना चाही।
- खाय मं पहिली कुरकुरा अऊ बाद मं नरम लगना चाही।
- घी के सोंधी खुशबू आना चाही, तेल के नई।
घर मं आसानी ले बनाव अरसा
सामग्री
- 500 ग्राम चांउर के आटा
- 400 ग्राम गुड़
- 50 ग्राम सफेद तिल
- 1 चम्मच सौंफ
- आधा चम्मच इलायची पाउडर
- तलई बर देसी घी
बनाय के तरीका
सबले पहिली गुड़ के एक तार चासनी बनाव। गरम चासनी मं चांउर के आटा, सौंफ अऊ इलायची मिलाके सख्त आटा गूंथव। चार घंटा ढंक के रखव। फेर लोई बनाके गोल आकार देव, ऊपर तिल चिपकाव अऊ धीमी आंच मं घी मं सुनहरा होय तक तल लेव।
रोचक जानकारी
- छत्तीसगढ़ मं कहावत हवय – “अरसा खाय बर मिलथे, त काम बन जथे।”
- बस्तर अंचल मं बिहाव तय होय के बाद लड़का पक्ष अरसा अऊ चूड़ा लेके लड़की के घर जाथे।
- एक मध्यम आकार के अरसा मं लगभग 180-200 कैलोरी होथे।
- आज अरसा सिरिफ गांव तक सीमित नई, बल्कि शहर, होटल अऊ आधुनिक कैफे मन तक अपन जगह बना चुके हवय।
अरसा रोटी छत्तीसगढ़ के सिरिफ एक पारंपरिक मिठाई नई, बल्कि अपन संस्कृति, परिवार, आस्था अऊ परंपरा के मीठा विरासत आय। साधारण चांउर, गुड़ अऊ तिल ले बने ये पकवान पीढ़ी दर पीढ़ी अपन पहचान ला संजोय रखे हवय। बदलत समय मं आधुनिक पैकेजिंग अऊ नए प्रयोग के कारण अरसा अब राष्ट्रीय स्तर तक अपन पहचान बना रहल हवय।
अगर आप छत्तीसगढ़ के असली स्वाद अऊ संस्कृति ला महसूस करना चाहत हव, त तिल ले सजे, घी मं तले सोंधे अरसा रोटी के स्वाद जरूर चखव। एक निवाला मं आपको छत्तीसगढ़ के अपनापन, परंपरा अऊ मिट्टी के खुशबू तीनों के एहसास होही।
